दिल Poetry (page 76)
बे-सबब वो न मिरे क़त्ल की तदबीर में था
शऊर बलगिरामी
बेजा न था उठ बैठना बेचैनी से मेरा
शऊर बलगिरामी
अर्ज़-ए-अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार करूँ या न करूँ
शऊर बलगिरामी
उदासी के दलदल में गिरता हुआ दिल
शुमाइला बहज़ाद
तुम्हारे नाम कर बैठे दिल-ओ-जाँ की ख़ुशी साहब
शुमाइला बहज़ाद
हूर हो या कोई परी हो तुम
शुजाअत इक़बाल
आज देखा जो कोई शख़्स दीवाना मिरे दोस्त
शुजाअत इक़बाल
लतीफ़ ऐसी कुछ इस दिल की शीशा-कारी थी
शुजाअत अली राही
वस्ल हुआ पर दिल में तमन्ना
शुजा ख़ावर
उस के बयान से हुए हर दिल अज़ीज़ हम
शुजा ख़ावर
यहाँ तो क़ाफ़िले भर को अकेला छोड़ देते हैं
शुजा ख़ावर
तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा
शुजा ख़ावर
तभी आएगी लबों पर मिरे दिल की बात खुल के
शुजा ख़ावर
समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले
शुजा ख़ावर
रखते हैं अपने ख़्वाबों को अब तक अज़ीज़ हम
शुजा ख़ावर
पहले हुआ जो करते थे हम वो नहीं रहे
शुजा ख़ावर
मेरा दिल हाथों में लो तो क्या तुम्हारा जाएगा
शुजा ख़ावर
ख़ुदा को आज़माना चाहिए था
शुजा ख़ावर
कहाँ कहाँ है ख़ुदा जाने राब्ता दिल का
शुजा ख़ावर
हालत उसे दिल की न दिखाई न ज़बाँ की
शुजा ख़ावर
गरचे बादल पानी बरसाता हुआ घर घर फिरा
शुजा ख़ावर
दिन के पास कहाँ जो हम रातों में माल बनाते हैं
शुजा ख़ावर
दश्त को जा तो रहे हो सोच लो कैसा लगेगा
शुजा ख़ावर
चेहरे पे थोड़ी रक्खी है
शुजा ख़ावर
अश्क जो आँख में उबलते हैं
शुजा
बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर
शोज़ेब काशिर
अब के बरस हूँ जितना तन्हा
शोज़ेब काशिर
हिज्र ओ विसाल
शोरिश काश्मीरी
ज़ख़्म-ए-दिल अब फूल बन कर खिल गया
शोला हस्पानवी
वो जिस के दिल में निहाँ दर्द दो-जहाँ का था
शोला हस्पानवी
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