दिल Poetry (page 77)
वो और होंगे जो वहम-ओ-गुमाँ के साथ चले
शोला हस्पानवी
उस ने फिर और क्या कहा होगा
शोला हस्पानवी
लबों पे अब कोई आह-ओ-फ़ुग़ाँ नहीं होती
शोला हस्पानवी
हुस्न जब क़ातिल न था और इश्क़ दीवाना न था
शोला हस्पानवी
बुतों में कोई भलाई भी है सिवाए सितम
शोला अलीगढ़ी
ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ से आ गई होंटों पे जाँ तलक
शोला अलीगढ़ी
न ख़ून-ए-दिल है न मय का ख़ुमार आँखों में
शोला अलीगढ़ी
मुँह से तिरे सौ बार के शरमाए हुए हैं
शोला अलीगढ़ी
हुजूम-ए-यास में लेने वो कब ख़बर आया
शोला अलीगढ़ी
दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुग़ाँ रहा
शोला अलीगढ़ी
ऐ हज़रत-ए-ईसा नहीं कुछ जा-ए-सुख़न अब
शोला अलीगढ़ी
ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को
शोहरत बुख़ारी
जब तुझे भूलना चाहा दिल ने
शोहरत बुख़ारी
ज़िंदगी तुझ पे गिराँ है तू मरेगा कैसे
शोहरत बुख़ारी
वो पास आए आस बने और पलट गए
शोहरत बुख़ारी
वो पास आए आस बने और पलट गए
शोहरत बुख़ारी
साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो
शोहरत बुख़ारी
रस्म-ए-गिर्या भी उठा दी हम ने
शोहरत बुख़ारी
कुछ हश्र से कम गर्मी-ए-बाज़ार नहीं है
शोहरत बुख़ारी
कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास
शोहरत बुख़ारी
जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है
शोहरत बुख़ारी
हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद
शोहरत बुख़ारी
हम पी गए सब हिले न लब तक
शोहरत बुख़ारी
हम पी गए सब हिले न अब तक
शोहरत बुख़ारी
हासिल-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं
शोहरत बुख़ारी
हर-चंद सहारा है तिरे प्यार का दिल को
शोहरत बुख़ारी
हर लम्हा था सौ साल का टलता भी तो कैसे
शोहरत बुख़ारी
इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है
शोहरत बुख़ारी
इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं
शोहरत बुख़ारी
दिल सख़्त निढाल हो गया है
शोहरत बुख़ारी
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