दिन Poetry (page 5)

क़यामत का कोई हंगाम उभरे

ज़काउद्दीन शायाँ

संग किसी के चलते जाएँ ध्यान किसी का रक्खें

ज़करिय़ा शाज़

कहाँ दिन रात में रक्खा हुआ हूँ

ज़करिय़ा शाज़

हम तुझ से कोई बात भी करने के नहीं थे

ज़करिय़ा शाज़

चेहरे जितने रूप बदलता रहता है

ज़का सिद्दीक़ी

उस पे करना मिरे नालों ने असर छोड़ दिया

ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़

ज़ोर से थोड़ी उसे पुकारा करना है

ज़हरा क़रार

ज़ब्त-ए-ग़म मुश्किल है और मुश्किल है मुश्किल का जवाब

ज़हीर अहमद ताज

किसी की याद-ए-रंगीं में है ये दिल बे-क़रार अब तक

ज़हीर अहमद ताज

अब तो ये भी होने लगा है हम में उन में बात नहीं

ज़ाहिदुल हक़

'अनीस-नागी' के नाम

ज़ाहिद मसूद

थूका हुआ आदमी

ज़ाहिद इमरोज़

बिसात-ए-शौक़ के मंज़र बदलते रहते हैं

ज़ाहिद फ़ारानी

मैं कि अफ़्सुर्दा मकानों में रहूँ

ज़ाहिद फख़री

ज़वाल का दिन

ज़ाहिद डार

नज़्म

ज़ाहिद डार

कुछ न होते होते इक दिन ये हुआ

ज़हीर रहमती

किसी दिन उक़्दा-ए-मुश्किल भी खुलता

ज़हीर रहमती

बहुत कुछ वस्ल के इम्कान होते

ज़हीर रहमती

आईने मद्द-ए-मुक़ाबिल हो गए

ज़हीर रहमती

ये कारोबार-ए-चमन इस ने जब सँभाला है

ज़हीर काश्मीरी

वो अक्सर बातों बातों में अग़्यार से पूछा करते हैं

ज़हीर काश्मीरी

हमराह लुत्फ़-ए-चश्म-ए-गुरेज़ाँ भी आएगी

ज़हीर काश्मीरी

ये सब कहने की बातें हैं हम उन को छोड़ बैठे हैं

ज़हीर देहलवी

वो किसी से तुम को जो रब्त था तुम्हें याद हो कि न याद हो

ज़हीर देहलवी

वो किस प्यार से कोसने दे रहे हैं

ज़हीर देहलवी

ग़ौग़ा-ए-पंद गो न रहा नौहागर रहा

ज़हीर देहलवी

बुतों से बच के चलने पर भी आफ़त आ ही जाती है

ज़हीर देहलवी

ग़ुरूर-ओ-नाज़-ओ-तकब्बुर के दिन तो कब के गए

ज़हीर अहमद ज़हीर

शब के ग़म दिन के अज़ाबों से अलग रखता हूँ

ज़फ़र सहबाई

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