दिया Poetry (page 13)

पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा

तहज़ीब हाफ़ी

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही

ताहिर फ़राज़

रंग क्या अजब दिया मेरी बेवफ़ाई को

ताहिर अदीम

बुझ रही है आँख ये जिस्म है जुमूद में

ताहिर अदीम

तन्हा कर के मुझ को सलीब-ए-सवाल पे छोड़ दिया

तफ़ज़ील अहमद

ये हाल मिरा मेरी मोहब्बत का सिला है

ताबिश सिद्दीक़ी

इक उम्र हुई और मैं अपने से जुदा हूँ

ताबिश सिद्दीक़ी

एक बुज़ुर्ग शायर परिंदे का तजरबा

ताबिश कमाल

ज़ेर-ए-लब रहा नाला दर्द की दवा हो कर

ताबिश देहलवी

बंद-ए-ग़म मुश्किल से मुश्किल-तर खुला

ताबिश देहलवी

बहुत जबीन-ओ-रुख़-ओ-लब बहुत क़द-ओ-गेसू

ताबिश देहलवी

यादों के साए हैं न उमीदों के हैं चराग़

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मैं ने कब दावा-ए-इल्हाम किया है 'ताबाँ'

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ज़िंदगी दिल पे अजब सेहर सा करती जाए

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ये हुजुम-ए-रस्म-ओ-रह दुनिया की पाबंदी भी है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

वो नाज़ुक सा तबस्सुम रह गया वहम-ए-हसीं बन कर

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

नुमू के फ़ैज़ से रंग-ए-चमन निखर सा गया

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

याँ तलक के है तिरे हिज्र में फ़रियाद कि बस

ताबाँ अब्दुल हई

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहरबाँ अपना

ताबाँ अब्दुल हई

मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया

ताबाँ अब्दुल हई

उन्स है ख़ाना-ए-सय्याद से गुलशन कैसा

तअशशुक़ लखनवी

सुब्ह को शाम लिख दिया मैं ने

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

कोई बतलाए माजरा क्या है

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

हर-सू ख़ुशबू को फ़ज़ाओं में बिखरता देखूँ

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

यूँ क़त्ल-ए-आम नौ-ए-बशर कर दिया गया

सय्यद ज़मीर जाफ़री

मुझ से मत कर यार कुछ गुफ़्तार मैं रोज़े से हूँ

सय्यद ज़मीर जाफ़री

बड़ी हैरत से अरबाब-ए-वफ़ा को देखता हूँ मैं

सय्यद ज़मीर जाफ़री

अपनी ख़बर नहीं है ब-जुज़ इस क़दर मुझे

सय्यद ज़मीर जाफ़री

अपनी ख़बर नहीं है ब-जुज़ ईं क़दर मुझे

सय्यद ज़मीर जाफ़री

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