दिया Poetry (page 38)

कैफ़ नसीब अब कहाँ ग़ुंचों के भी जमाल में

रज़ा जौनपुरी

ये किस मक़ाम पे ठहरा है कारवान-ए-वफ़ा

रज़ा हमदानी

सहरा-ए-ख़याल का दिया हूँ

रज़ा हमदानी

ख़राब-ए-इश्क़ सही आलम-ए-शुहूद में हूँ

रज़ा हमदानी

मौत भी आती नहीं हिज्र के बीमारों को

रज़ा अज़ीमाबादी

मैं ही नहीं हूँ बरहम उस ज़ुल्फ़-ए-कज-अदा से

रज़ा अज़ीमाबादी

सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को

रविश सिद्दीक़ी

रंग उस महफ़िल-ए-तमकीं में जमाया न गया

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

ख़्वाब-ए-दीदार न देखा हम ने

रविश सिद्दीक़ी

ख़ल्वती-ए-ख़याल को होश में कोई लाए क्यूँ

रविश सिद्दीक़ी

कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था

रविश सिद्दीक़ी

फ़रोग़-ए-गुल से अलग बर्क़-ए-आशियाँ से अलग

रविश सिद्दीक़ी

दिन को हाँ कह दिया तो रात नहीं

रौनक़ टोंकवी

हमारी जीत यही थी कि ख़ुद से हार आए

रौनक़ रज़ा

भूली-बिसरी ख़्वाहिशों का बोझ आँखों पर न रख

रौनक़ रज़ा

कितनी सदियों से लम्हों का लोबान जलता रहा

रउफ़ ख़लिश

पत्ते तमाम हल्क़ा-ए-सरसर में रह गए

रऊफ़ ख़ैर

मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी

रतन पंडोरवी

घर से निकल के आए हैं बाज़ार के लिए

रसूल साक़ी

कुछ हद भी ऐ फ़लक सितम-ए-ना-रवा की है

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

दोस्त के शहर में जब मैं पहुँचा शहर का मंज़र अच्छा था

रासिख़ फारानी

लूटा जाने वालों ने

राशिद मुफ़्ती

किसी की जीत का सदमा किसी की मात का बोझ

राशिद मुफ़्ती

और ज़रा कज मिरी कुलाह तो होती

राशिद मुफ़्ती

अब क्या गिला कि रूह को खिलने नहीं दिया

राशिद मुफ़्ती

इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

फूल सोए हुए थे छाती पर

रशीद इमकान

कोई साया न शजर याद आया

राशिद हामिदी

आँख खुली तो मुझ को ये इदराक हुआ

राशिद हामिदी

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