दिया Poetry (page 36)

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सबा अख़्तर

ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया

सबा अकबराबादी

सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई

सबा अफ़ग़ानी

वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं

साइल देहलवी

हम कि चेहरे पे न लाए कभी वीरानी को

सादुल्लाह शाह

हँसी की बात कि उस ने वहाँ बुला के मुझे

सादुल्लाह शाह

दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल

एस ए मेहदी

कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ

एस ए मेहदी

कैफ़-ए-सुरूर-ओ-सोज़ के क़ाबिल नहीं रहा

एस ए मेहदी

तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ

रूही कंजाही

तुझ बिन रह-ए-हयात में लुत्फ़-ए-सफ़र कहाँ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

तिलिस्म-ए-नश्शा-ए-दुनिया भी आज ख़त्म हुआ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

रू-ए-ज़मीं नहीं कि सर-ए-आसमाँ नहीं

रोहित सोनी ‘ताबिश’

था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

ताख़ीर आ पड़ी जो बदन के ज़ुहूर में

रियाज़ लतीफ़

ख़ुद अपना इंतिज़ार भी

रियाज़ लतीफ़

ख़ला की रूह किस लिए हो मेरे इख़्तियार में

रियाज़ लतीफ़

शोख़ी से हर शगूफ़े के टुकड़े उड़ा दिए

रियाज़ ख़ैराबादी

पाऊँ तो उन हसीनों के मुँह चूम लूँ 'रियाज़'

रियाज़ ख़ैराबादी

पाऊँ तो इन हसीनों का मुँह चूम लूँ 'रियाज़'

रियाज़ ख़ैराबादी

इस वास्ते कि आव-भगत मय-कदे में हो

रियाज़ ख़ैराबादी

उफ़ रे उभार उफ़ रे ज़माना उठान का

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई पूछे न हम से क्या हुआ दिल

रियाज़ ख़ैराबादी

जोबन उन का उठान पर कुछ है

रियाज़ ख़ैराबादी

हंस के पैमाना दिया ज़ालिम ने तरसाने के बा'द

रियाज़ ख़ैराबादी

दिल ढूँढती है निगह किसी की

रियाज़ ख़ैराबादी

बाला-ए-बाम ग़ैर है में आस्तान पर

रियाज़ ख़ैराबादी

उदास उदास थे हम उस को इक ज़माना हुआ

रिन्द साग़री

ज़ुल्फ़ें छोड़ीं हैं कि जोड़ा उस ने छोड़ा साँप का

रिन्द लखनवी

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

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