दिया Poetry (page 84)

इक लम्हे ने जीवन-धारा रोक लिया

अकबर हमीदी

बोले कि तुझ को दीन की इस्लाह फ़र्ज़ है

अकबर इलाहाबादी

ख़ुशी क्या हो जो मेरी बात वो बुत मान जाता है

अकबर इलाहाबादी

जब यास हुई तो आहों ने सीने से निकलना छोड़ दिया

अकबर इलाहाबादी

हर इक ये कहता है अब कार-ए-दीं तो कुछ भी नहीं

अकबर इलाहाबादी

हल्क़े नहीं हैं ज़ुल्फ़ के हल्क़े हैं जाल के

अकबर इलाहाबादी

इक बोसा दीजिए मिरा ईमान लीजिए

अकबर इलाहाबादी

दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला

अकबर इलाहाबादी

दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो

अकबर इलाहाबादी

चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं

अकबर इलाहाबादी

बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी

अकबर इलाहाबादी

अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए

अकबर इलाहाबादी

तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे

अकबर अली खान अर्शी जादह

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है

अजमल सिराज

रास्ते के पेच-ओ-ख़म क्या शय हैं सोचा ही नहीं

अजमल अजमली

मुख़ालिफ़ आँधियों में अज़्म के दीपक जलाता हूँ

अजीत सिंह हसरत

हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के

अजय सहाब

हम तिरे ख़्वाबों की जन्नत से निकल कर आ गए

ऐतबार साजिद

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए

ऐतबार साजिद

मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था

ऐतबार साजिद

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है

ऐतबार साजिद

किसी ने दिल के ताक़ पर जला के रख दिया हमें

ऐतबार साजिद

किसी को हम से हैं चंद शिकवे किसी को बेहद शिकायतें हैं

ऐतबार साजिद

कहा तख़्लीक़-ए-फ़न बोले बहुत दुश्वार तो होगी

ऐतबार साजिद

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

जो होता आह तिरी आह-ए-बे-असर में असर

ऐश देहलवी

मैं हँस रहा था गरचे मिरे दिल में दर्द था

ऐश बर्नी

पाँव फँसे में हाथ छुड़ाने आया था

ऐनुद्दीन आज़िम

मुझी में जीता है सूरज तमाम होने तक

ऐनुद्दीन आज़िम

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