दिया Poetry (page 82)

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

नज़्म तकमील

अलीना इतरत

बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें

अलीम अफ़सर

अहद-ए-कम-कोशी में ये भी हौसला मैं ने किया

आलमताब तिश्ना

उर्दू

आलम मुज़फ्फ़र नगरी

तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो

आलम ख़ुर्शीद

क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ

आलम ख़ुर्शीद

मैं नहीं हूँ नहीं कहीं भी नहीं

अकरम नक़्क़ाश

यूँ ही रक्खोगे इम्तिहाँ में क्या

अकरम महमूद

कमान छोड़ गए बे-नज़ीर जितने थे

अकमल इमाम

तर्ग़ीब और उस के ब'अद

अख़्तर-उल-ईमान

सब्ज़ा-ए-बेगाना

अख़्तर-उल-ईमान

मस्जिद

अख़्तर-उल-ईमान

कार-नामा

अख़्तर-उल-ईमान

अहद-ए-वफ़ा का क़र्ज़ अदा कर दिया गया

अख़्तर ज़ियाई

आँख दरिया जिगर लहू करना

अख़्तर ज़ियाई

शाम

अख़्तर उस्मान

मैं अजब आदमी हूँ

अख़्तर उस्मान

मुद्दतों में आज दिल ने फ़ैसला आख़िर दिया

अख्तर शुमार

मैं ज़िंदगी के सफ़र में था मश्ग़ला उस का

अख्तर शुमार

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

अख्तर शुमार

या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है

अख्तर शुमार

वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता

अख्तर शुमार

लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँ न जाने दिया

अख्तर शुमार

ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना

अख़्तर शीरानी

नन्हा क़ासिद

अख़्तर शीरानी

दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा आह कर लूँगा

अख़्तर शीरानी

ऐ इश्क़ कहीं ले चल

अख़्तर शीरानी

वादा उस माह-रू के आने का

अख़्तर शीरानी

उस मह-जबीं से आज मुलाक़ात हो गई

अख़्तर शीरानी

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