दोस्त Poetry (page 25)

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

ये ख़ूब-रू न छुरी ने कटार रखते हैं

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

दिल अब उस दिल-शिकन के पास कहाँ

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

शौक़ को बे-अदब किया इश्क़ को हौसला दिया

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

बशीर बद्र

पता नहीं वो कौन था

बशर नवाज़

जब कभी होंगे तो हम माइल-ए-ग़म ही होंगे

बशर नवाज़

सब दोस्त मस्लहत के दुकानों में बिक गए

बाक़ी अहमदपुरी

बीसवीं सदी के हम शाइ'र-ए-परेशाँ हैं

बनो ताहिरा सईद

शायद

बलराज कोमल

नन्हा शहसवार

बलराज कोमल

दिल का मोआ'मला वही महशर वही रहा

बलराज कोमल

रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है

बख़्श लाइलपूरी

फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं

अज़ीज़ नबील

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

तिरी कोशिश हम ऐ दिल सई-ए-ला-हासिल समझते हैं

अज़ीज़ लखनवी

ग़म-ए-हयात ओ ग़म-ए-दोस्त की कशाकश में

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ

अज़ीज़ हामिद मदनी

सँभल न पाए तो तक़्सीर-ए-वाक़ई भी नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

न फ़ासले कोई निकले न क़ुर्बतें निकलीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

फ़िराक़ से भी गए हम विसाल से भी गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

आज मुक़ाबला है सख़्त मीर-ए-सिपाह के लिए

अज़ीज़ हामिद मदनी

घर से बाहर निकल कर

अज़ीज़ अन्सारी

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