दुनिया Poetry (page 16)
यूँ तो सब सामान पड़ा है
सुरेन्द्र शजर
क्या ये ही है मेरी दुनिया मैं जिस से वाबस्ता हूँ
सुनील कुमार जश्न
तुझ में सब मंज़र महफ़ूज़
सुलतान सुबहानी
लहू-रंग सय्याल रौशन भँवर
सुलतान सुबहानी
अभी तक साँस लम्हे बुन रही है
सुलतान सुबहानी
अपने ही टूटे हुए ख़्वाबों को दिल चुनता भी है
सुल्तान सब्र वानी
धूप की शिद्दत में नंगे पाँव नंगे सर निकल
सुलतान रशक
तुझ को पाने के लिए ख़ाक-ए-तमन्ना हो जाऊँ
सुल्तान अख़्तर
रक़्स-ए-ताऊस-ए-तमन्ना नहीं होने वाला
सुल्तान अख़्तर
कुछ डूबता उभरता सा रहता है सामने
सुल्तान अख़्तर
झूट रौशन है कि सच्चाई नहीं जानते हैं
सुल्तान अख़्तर
छीन ले क़ुव्वत बीनाई ख़ुदाया मुझ से
सुल्तान अख़्तर
अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं
सुल्तान अख़्तर
वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था
सुलेमान ख़ुमार
तुझ से बिछड़ूँ तो ये ख़दशा है अकेला हो जाऊँ
सुलेमान ख़ुमार
कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ
सुलेमान ख़ुमार
एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया
सुलैमान अरीब
एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया
सुलैमान अरीब
तुम किस से मिलने आए हो
सुलैमान अरीब
प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई
सुलैमान अरीब
नहीं जो तेरी ख़ुशी लब पे क्यूँ हँसी आए
सुलैमान अरीब
मेरा साया है मिरे साथ जहाँ जाऊँ मैं
सुलैमान अरीब
कोई दुश्मन कोई हमदम भी नहीं साथ अपने
सुलैमान अरीब
भेस क्या क्या न ज़माने में बनाए हम ने
सुलैमान अरीब
और कर लेंगे वो क्या अब हमें रुस्वा कर के
सुलैमान अहमद मानी
किसी की याद में शमएँ जलाना भूल जाता है
सुहैल सानी
हमारे जैसे ही लोगों से शहर भर गए हैं
सुहैल अख़्तर
तमन्ना दिल में घर करती बहुत है
सुहैल अहमद ज़ैदी
ख़ैर उस से न सही ख़ुद से वफ़ा कर डालो
सुहैल अहमद ज़ैदी
इसी मामूल-ए-रोज़-ओ-शब में जी का दूसरा होना
सुहैल अहमद ज़ैदी
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