दुनिया Poetry (page 18)

फ़ितरत-ए-इश्क़ गुनहगार हुई जाती है

सिराज लखनवी

दुनिया का न उक़्बा का कोई ग़म नहीं सहते

सिराज लखनवी

बे-समझे-बूझे मोहब्बत की इक काफ़िर ने ईमान लिया

सिराज लखनवी

सनम ख़ुश तबईयाँ सीखे हो तुम किन किन ज़रीफ़ों सीं

सिराज औरंगाबादी

आलम के दोस्तों में मुरव्वत नहीं रही

सिराज औरंगाबादी

कहाँ तलक तिरी यादों से तख़लिया कर लें

सिरज़ अालम ज़ख़मी

बहुत उदास है दिल जाने माजरा क्या है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

तिरे आते ही सब दुनिया जवाँ मालूम होती है

सिकंदर अली वज्द

ख़ुशी याद आई न ग़म याद आए

सिकंदर अली वज्द

ग़मगीन बे-मज़ा बड़ी तन्हा उदास है

सिदरा सहर इमरान

बे-ख़याली में कहा था कि शनासाई नहीं

सिदरा सहर इमरान

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

एक बे-मंज़र उदासी चार-सू आँखों में है

सिद्दीक़ मुजीबी

दिल-ए-आईना-सामाँ पारा पारा कर के देखा जाए

सिद्दीक़ मुजीबी

आरज़ू जीने की थी इम्कान जीने का न था

सिद्दीक़ मुजीबी

निकाल लाया है घर से ख़याल का क्या हो

सिद्दीक़ शाहिद

कार-ए-मुश्किल ही किया दुनिया में गर मैं ने किया

सिद्दीक़ शाहिद

फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता हमारा हो

सिद्दीक़ शाहिद

दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया भी नहीं

सिद्दीक़ शाहिद

मिरे दिल की अब ऐ अश्क-ए-नदामत शुस्त-ओ-शू कर दे

श्याम सुंदर लाल बर्क़

ख़ुदाया हिन्द पर तेरी इनायत हो इनायत हो

श्याम सुंदर लाल बर्क़

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

ग़म की भट्टी में ब-सद-शौक़ उतर जाऊँगा

श्याम सुन्दर नंदा नूर

ये दुनिया-दारी और इरफ़ान का दावा 'शुजा-ख़ावर'

शुजा ख़ावर

यहाँ तो क़ाफ़िले भर को अकेला छोड़ देते हैं

शुजा ख़ावर

विज्दान में वो आया इल्हाम हुआ मुझ को

शुजा ख़ावर

इस तरह पहुँचेगा कैसे पाया-ए-तकमील को

शुजा ख़ावर

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

निकलने वाले न थे ज़िंदगी के खेल से हम

शोज़ेब काशिर

अब के बरस हूँ जितना तन्हा

शोज़ेब काशिर

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