दुनिया Poetry (page 20)

ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है

शेर सिंह नाज़ देहलवी

क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में वो तूफ़ान का आलम हुआ

शेर सिंह नाज़ देहलवी

वक़्त आफ़ाक़ के जंगल का जवाँ चीता है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

ज़ौक़

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे

ज़ौक़

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ज़ौक़

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

ज़ौक़

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

ज़ौक़

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

ज़ौक़

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

हम हैं और शुग़्ल-ए-इश्क़-बाज़ी है

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे

ज़ौक़

आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती है

ज़ौक़

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा

शैख़ अली बख़्श बीमार

मुझ को ज़िंदा रहने का इक जज़्बा आ के मार गया

शहज़ाद रज़ा लम्स

नसब ये है कि वो दुश्मन को कम-नसब न कहे

शहपर रसूल

रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

आँखें कहीं दिमाग़ कहीं दस्त ओ पा कहीं

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

दर-गुज़र

शाज़ तमकनत

वो कौन है जिस की वहशत पर सुनते हैं कि जंगल रोता है

शाज़ तमकनत

शिकन शिकन तिरी यादें हैं मेरे बिस्तर की

शाज़ तमकनत

साँसों में बसे हो तुम आँखों में छुपा लूँगा

शाज़ तमकनत

सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए

शाज़ तमकनत

न महफ़िल ऐसी होती है न ख़ल्वत ऐसी होती है

शाज़ तमकनत

मैं तो चुप था मगर उस ने भी सुनाने न दिया

शाज़ तमकनत

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