दुनिया Poetry (page 21)
मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो
शाज़ तमकनत
कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह
शाज़ तमकनत
जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर
शाज़ तमकनत
छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी
शाज़ तमकनत
शिकोह-ए-ज़ात से दुश्मन का लश्कर काँप जाता है
शायान क़ुरैशी
शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है
शायान क़ुरैशी
सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब
शायान क़ुरैशी
मारे ग़ुस्से के ग़ज़ब की ताब रुख़्सारों में है
शौक़ क़िदवाई
ज़ाहिरन ये बुत तो हैं नाज़ुक गुल-ए-तर की तरह
शौक़ बहराइची
तर्क-ए-लज़्ज़ात पे माइल जो ब-ज़ाहिर है मिज़ाज
शौक़ बहराइची
शैख़ ओ बरहमन दोनों हैं बर-हक़ दोनों का हर काम मुनासिब
शौक़ बहराइची
न जब देखी गई मेरी तड़प मेरी परेशानी
शौक़ बहराइची
न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है
शौक़ बहराइची
बड़े वसूक़ से दुनिया फ़रेब देती रही
शाैकत वास्ती
मेरे महबूब मिरे दिल को जलाया न करो
शौकत परदेसी
ग़म की अँधेरी राहों में तो तुम भी नहीं काम आओ हो
शौकत परदेसी
पलट के दौर-ए-ज़माँ सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर
शातिर हकीमी
दर से मायूस तिरे तालिब-ए-इकराम चले
शातिर हकीमी
आइना देखूँ मगर क्या देखूँ
शर्मा तासीर
सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए
शारिक़ कैफ़ी
कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए
शारिक़ कैफ़ी
नज़र भर देख लूँ बस
शारिक़ कैफ़ी
मरने वाले से जलन
शारिक़ कैफ़ी
दूसरे हाथ का दुख
शारिक़ कैफ़ी
छुट्टी का दिन
शारिक़ कैफ़ी
बीच भँवर से लौट आऊँगा
शारिक़ कैफ़ी
बहरूपिया
शारिक़ कैफ़ी
अजब मुश्किल है मेरी
शारिक़ कैफ़ी
ये सच है दुनिया बहुत हसीं है
शारिक़ कैफ़ी
सियाने थे मगर इतने नहीं हम
शारिक़ कैफ़ी
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