दुनिया Poetry (page 23)

तन्हाई का ग़म ढोएँ और रो रो जी हलकान करें

शाकिर ख़लीक़

उल्फ़त में बिगड़ कर भी इक वज़्अ निकाली है

शाकिर इनायती

ज़ात का गहरा अंधेरा है बिखर जा मुझ में

शकील मज़हरी

जुज़-निहालआरज़ू सीने में क्या रखता हूँ मैं

शकील जाज़िब

जाँ के ज़ियाँ को ग़म की तलाफ़ी समझ लिया

शकील जाज़िब

हो गई है मिरी उजड़ी हुई दुनिया आबाद

शकील जमाली

तुम शुजाअ'त के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए

शकील जमाली

सफ़र से लौट जाना चाहता है

शकील जमाली

न कोई ख़्वाब कमाया न आँख ख़ाली हुई

शकील जमाली

कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है

शकील जमाली

कितने अख़बार-फ़रोशों को सहाफ़ी लिक्खा

शकील जमाली

खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है

शकील जमाली

इसी दुनिया के इसी दौर के हैं

शकील जमाली

दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है

शकील जमाली

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए

शकील जमाली

अब बंद जो इस अब्र-ए-गुहर-बार को लग जाए

शकील जमाली

हम पर जितने वार हुए भरपूर हुए

शकील ग्वालिआरी

न पैमाने खनकते हैं न दौर-ए-जाम चलता है

शकील बदायुनी

मिरी तेज़-गामियों से नहीं बर्क़ को भी निस्बत

शकील बदायुनी

लम्हे उदास उदास फ़ज़ाएँ घुटी घुटी

शकील बदायुनी

ग़म की दुनिया रहे आबाद 'शकील'

शकील बदायुनी

बदलती जा रही है दिल की दुनिया

शकील बदायुनी

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

इक शहंशाह ने बनवा के....

शकील बदायुनी

अलीगढ़ छोड़ने के ब'अद

शकील बदायुनी

ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है

शकील बदायुनी

वो हम से दूर होते जा रहे हैं

शकील बदायुनी

तिरी यादों से दिल फ़रोज़ाँ करेंगे

शकील बदायुनी

शोख़ नज़रों में जो शामिल बरहमी हो जाएगी

शकील बदायुनी

शिकवा-ए-इज़्तिराब कौन करे

शकील बदायुनी

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