दुनिया Poetry (page 99)

न घर है कोई न सामान कुछ रहा बाक़ी

अहमद हमेश

किस तवक़्क़ो' पे क्या उठा रखिए

अहमद हमेश

किस का शोअ'ला जल रहा है शो'लगी से मावरा

अहमद हमेश

जहाँ से होता है प्यारे ख़ुदा का नाम शुरूअ'

अहमद हमेश

जब से मैं ख़ुद को खो रहा हूँ

अहमद हमेश

ख़याल-ओ-ख़्वाब से घर कब तलक सजाएँ हम

अहमद हमदानी

अज़ल अबद से बहुत दूर झूमते थे हम

अहमद हमदानी

दिन से बिछड़ी हुई बारात लिए फिरती है

अहमद फ़रीद

तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई

अहमद फ़राज़

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया

अहमद फ़राज़

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

अहमद फ़राज़

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बाद ये मालूम

अहमद फ़राज़

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

अहमद फ़राज़

'फ़राज़' इश्क़ की दुनिया तो ख़ूब-सूरत थी

अहमद फ़राज़

तसलसुल

अहमद फ़राज़

सरहदें

अहमद फ़राज़

काली दीवार

अहमद फ़राज़

वहशत-ए-दिल सिला-ए-आबला-पाई ले ले

अहमद फ़राज़

तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त

अहमद फ़राज़

तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़

अहमद फ़राज़

सब क़रीने उसी दिलदार के रख देते हैं

अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

अहमद फ़राज़

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं

अहमद फ़राज़

न दिल से आह न लब से सदा निकलती है

अहमद फ़राज़

मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं

अहमद फ़राज़

किसी जानिब से भी परचम न लहू का निकला

अहमद फ़राज़

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो

अहमद फ़राज़

जब तिरी याद के जुगनू चमके

अहमद फ़राज़

हम तो ख़ुश थे कि चलो दिल का जुनूँ कुछ कम है

अहमद फ़राज़

हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू

अहमद फ़राज़

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