फ़िराक़ Poetry (page 5)

शब-ए-सुरूर नई दास्ताँ विसाल-ओ-फ़िराक़

सहबा वहीद

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को

सहबा अख़्तर

मेरे तसव्वुरात हैं तहरीरें इश्क़ की

साग़र सिद्दीक़ी

उस्ताद मर गए

साग़र ख़य्यामी

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

दुम

साग़र ख़य्यामी

शम-ए-हसरत जला गए आँसू

सफ़िया शमीम

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

उसी हसीं से चमन में बहार आज भी है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ऐसी ही इंतिज़ार में लज़्ज़त अगर न हो

रियाज़ ख़ैराबादी

किसी से वस्ल में सुनते ही जान सूख गई

रियाज़ ख़ैराबादी

ग़रीब हम हैं ग़रीबों की भी ख़ुशी हो जाए

रियाज़ ख़ैराबादी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

उम्र-भर इश्क़ किसी तौर न कम हो आमीन

रहमान फ़ारिस

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

इश्क़ के जाँ-निसार जीते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

हज़ार रुख़ तिरे मिलने के हैं न मिलने में

रविश सिद्दीक़ी

शिकस्त-ए-रंग-ए-तमन्ना को अर्ज़-ए-हाल कहूँ

रविश सिद्दीक़ी

हमारे ख़्वाब हमारी पसंद होते गए

रौनक़ रज़ा

आज़ार-ए-दिल से रंग-ए-तबीअ'त बदल गया

रऊफ़ यासीन जलाली

मैं जंग जीत के जब्र-ओ-अना की हार गया

रासिख़ इरफ़ानी

यक़ीं से फूटती है या गुमाँ से आती है

राशिद तराज़

तर्क-ए-सितम पे वो जो क़सम खा के रह गए

रशीद रामपुरी

जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए

रशीद लखनवी

हम अजल के आने पर भी तिरा इंतिज़ार करते

रशीद लखनवी

अगर दिला ग़म-ए-गेसू-ए-यार बढ़ जाता

रशीद लखनवी

तरह-ए-कशां जिसे हिज्रान-ए-यार कहते हैं

रशीद कौसर फ़ारूक़ी

निगाह तूर पे है और जमाल सीने में

रम्ज़ अज़ीमाबादी

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