शोक Poetry (page 103)

रानाई-ए-कौनैन से बे-ज़ार हमीं थे

एहसान दानिश

परस्तिश-ए-ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं

एहसान दानिश

नज़र फ़रेब-ए-क़ज़ा खा गई तो क्या होगा

एहसान दानिश

न सियो होंट न ख़्वाबों में सदा दो हम को

एहसान दानिश

कल रात कुछ अजीब समाँ ग़म-कदे में था

एहसान दानिश

अब कहो कारवाँ किधर को चले

एहसान दानिश

आया नहीं है राह पे चर्ख़-ए-कुहन अभी

एहसान दानिश

हर दर्द से बाँधे हुए रिश्ता कोई गुज़रे

डाक्टर मोहम्मद अली जौहर

ज़ोम का ही तो आरिज़ा है मुझे

डॉक्टर आज़म

शौक़ बाक़ी नहीं बाक़ी नहीं अब जोश-ओ-ख़रोश

डॉक्टर आज़म

हर शख़्स में कुछ लोग कमी ढूँड रहे हैं

डॉक्टर आज़म

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती

दिवाकर राही

इस शहर-ए-निगाराँ की कुछ बात निराली है

दिवाकर राही

रवानी ग़म की जिस में थी वो जौहर दे दिया मैं ने

दिलदार हाश्मी

लग गए हैं फ़ोन लगने में जो पच्चीस साल

दिलावर फ़िगार

क्रिकेट और मुशाइरा

दिलावर फ़िगार

हुस्न पर ए'तिबार हद कर दी

दिलावर फ़िगार

ज़िंदगी इस तरह गुज़ारी है

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

देखते देखते ही साल गुज़र जाता है

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

तेरा क्या जाता जो मिलता जाम-ए-रेहानी मुझे

धनपत राय थापर राज़

कुछ यूँ सफ़र के शौक़ ने मंज़र दिखाए हैं

देवमणि पांडेय

जब भी चली है तेरी बात

देवमणि पांडेय

दिल ने चाहा बहुत और मिला कुछ नहीं

देवमणि पांडेय

आईने में देख के चेहरा बे-शक मैं हैरान हुआ

देवमणि पांडेय

सुना है ख़ुद को

दीप्ति मिश्रा

डाइरी

दीप्ति मिश्रा

दिल से जब लौ लगी नहीं होती

दीद राही

ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे

द्वारका दास शोला

मेरी मंज़िल कहाँ है क्या मा'लूम

द्वारका दास शोला

इंसाँ ब-यक निगाह बुरा भी भला भी है

द्वारका दास शोला

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