शोक Poetry (page 102)

कहाँ सबात-ए-ग़म-ए-दिल कहाँ सराब-ए-सुकूँ

एजाज़ वारसी

दिल बुझ गया तो गर्मी-ए-बाज़ार भी नहीं

एजाज़ वारसी

दुनिया सबब-ए-शोरिश-ए-ग़म पूछ रही है

एजाज़ सिद्दीक़ी

नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

एजाज़ सिद्दीक़ी

मिल सकेगी अब भी दाद-ए-आबला-पाई तो क्या

एजाज़ सिद्दीक़ी

दुनिया सबब-ए-शोरिश-ए-ग़म पूछ रही है

एजाज़ सिद्दीक़ी

ज़ालिम से मुस्तफ़ा का अमल चाहते हैं लोग

एजाज़ रहमानी

रंग मौसम के साथ लाए हैं

एजाज़ रहमानी

नक़्श-बर-आब हो गया हूँ मैं

एजाज़ रहमानी

मिट गया ग़म तिरे तकल्लुम से

एजाज़ रहमानी

हँसने में रोने की आदत कभी ऐसी तो न थी

एजाज़ उबैद

ग़म भी उतना नहीं कि तुम से कहें

एजाज़ उबैद

मंज़र-ए-वक़्त की यकसानी में बैठा हुआ हूँ

एजाज़ गुल

अक्स उभरा न था आईना-ए-दिल-दारी का

एजाज़ गुल

ख़ुद को जब लग गई नज़र अपनी

एजाज़ तालिब

कितना कमज़ोर है ईमान पता लगता है

अहया भोजपुरी

मंज़िल न मिली तो ग़म नहीं है

एहतिशाम हुसैन

उन आँखों को नज़र क्या आ गया है

एहतिशाम हुसैन

गुलशन-ए-दिल में मिले अक़्ल के सहरा में मिले

एहतिशाम हुसैन

डर डर के जिसे मैं सुन रहा हूँ

एहतिशाम हुसैन

अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक

एहतिशाम हुसैन

सता रही है बहुत मछलियों की बास मुझे

एहतिशाम अख्तर

मिरी हयात को बे-रब्त बाब रहने दे

एहतिशाम अख्तर

चराग़ दिल का था रौशन बुझा गया पानी

एहतिशाम अख्तर

याद तेरी जो कभी आती है बहलाने को

एहसान दरबंगावी

रहता नहीं इंसान तो मिट जाता है ग़म भी

एहसान दानिश

मक़्सद-ए-ज़ीस्त ग़म-ए-इश्क़ है सहरा हो कि शहर

एहसान दानिश

आज उस ने हँस के यूँ पूछा मिज़ाज

एहसान दानिश

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा

एहसान दानिश

तौबा की नाज़िशों पे सितम ढा के पी गया

एहसान दानिश

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