शोक Poetry (page 105)
क़त्ल-ए-आशिक़ किसी माशूक़ से कुछ दूर न था
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
जग में कोई न टुक हँसा होगा
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
चमन में सुब्ह ये कहती थी हो कर चश्म-ए-तर शबनम
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा
ख़्वाजा मीर 'दर्द'
एक सब आग एक सब पानी
दानियाल तरीर
शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया
दानिश फ़राही
दुआ हमारी कभी बा-असर नहीं होती
दानिश फ़राही
रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने से
दानिश अलीगढ़ी
ज़िंदगी कर गई तूफ़ाँ के हवाले मुझ को
दानिश अलीगढ़ी
वाइज़ तू अगर उन के कूचे से गुज़र जाए
दानिश अलीगढ़ी
बुलंद ज़ीस्त का अपनी वक़ार हो न सका
दामोदर ठाकुर ज़की
शिरकत-ए-ग़म भी नहीं चाहती ग़ैरत मेरी
दाग़ देहलवी
फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं
दाग़ देहलवी
उस के दर तक किसे रसाई है
दाग़ देहलवी
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं
दाग़ देहलवी
तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं
दाग़ देहलवी
पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह
दाग़ देहलवी
फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर
दाग़ देहलवी
ना-रवा कहिए ना-सज़ा कहिए
दाग़ देहलवी
काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
दाग़ देहलवी
फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं
दाग़ देहलवी
दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
दाग़ देहलवी
दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
दाग़ देहलवी
यूँही जलाए चलो दोस्तो भरम के चराग़
डी. राज कँवल
नज़रों के गिर्द यूँ तो कोई दायरा न था
डी. राज कँवल
इंसान नहीं वो जो गुनहगार नहीं हैं
डी. राज कँवल
हम को छेड़ा तो मचल जाएँगे अरमाँ की तरह
डी. राज कँवल
बी.टी-नामा
कर्नल मोहम्मद ख़ान
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