शोक Poetry (page 142)

दश्त-ए-वफ़ा

अहमद नदीम क़ासमी

यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ

अहमद नदीम क़ासमी

साँस लेना भी सज़ा लगता है

अहमद नदीम क़ासमी

मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता

अहमद नदीम क़ासमी

मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे

अहमद नदीम क़ासमी

हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते

अहमद नदीम क़ासमी

होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम

अहमद नदीम क़ासमी

फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो

अहमद नदीम क़ासमी

एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का

अहमद नदीम क़ासमी

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है

अहमद मुश्ताक़

ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी

अहमद मुश्ताक़

शाम-ए-ग़म याद है कब शम्अ' जली याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

शबनम को रेत फूल को काँटा बना दिया

अहमद मुश्ताक़

मलाल-ए-दिल से इलाज-ए-ग़म-ए-ज़माना किया

अहमद मुश्ताक़

किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा

अहमद मुश्ताक़

ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

दिल में वो शोर न आँखों में वो नम रहता है

अहमद मुश्ताक़

छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से

अहमद मुश्ताक़

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

जो तिरे ग़म की गिरानी से निकल सकता है

अहमद ख़याल

ज़रा ज़रा सी कई कश्तियाँ बना लेना

अहमद कमाल परवाज़ी

यही दिल जो इक बूँद है बहर-ए-ग़म की

अहमद जावेद

सबा देख इक दिन इधर आन कर के

अहमद जावेद

किसी का ध्यान मह-ए-नीम-माह में आया

अहमद जावेद

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