शोक Poetry (page 45)

तन्हा खड़े हैं हम सर-ए-बाज़ार क्या करें

शबनम शकील

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

मौसम के पास कोई ख़बर मो'तबर भी हो

शबनम शकील

हम तो गवाह हैं कि ग़लत था लिखा गया

शबनम शकील

गए बरस की यही बात यादगार रही

शबनम शकील

दोस्तों का ज़िक्र क्या दुश्मन हैं जब बदले हुए

शबनम शकील

दिल में ख़ूँ और आँख में पानी बहुत

शबनम शकील

दर आया अंधेरा आँखों में और सब मंज़र धुँदलाए हैं

शबनम शकील

जब ख़िलाफ़-ए-मस्लहत जीने की नौबत आई थी

शब्बीर शाहिद

जब ख़िलाफ़-ए-मस्लहत जीने की नौबत आई थी

शब्बीर शाहिद

मैं रतजगों का सफ़ीर ठहरा था कितनी रातें गुज़ार आया

शब्बीर नकिद

ये तो सोचा ही नहीं उस को जुदा करते हुए

शबाना यूसुफ़

ये तो सोचा ही नहीं उस को जुदा करते हुए

शबाना यूसुफ़

हद्द-ए-सितम न कर कि ज़माना ख़राब है

शबाब ललित

कभी भूल कर भी न बात की मुझे दिल से ऐसा भुला दिया

शबाब

उन का ग़म भी न रहा पास तो फिर क्या होगा

शायर लखनवी

जो थके थके से थे हौसले वो शबाब बन के मचल गए

शायर लखनवी

जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए

शायर लखनवी

इक तबस्सुम से हम ने रोक लिए

शायर लखनवी

वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

उम्मीद के उफ़ुक़ से न उट्ठा ग़ुबार तक

शानुल हक़ हक़्क़ी

तुम से उल्फ़त के तक़ाज़े न निबाहे जाते

शानुल हक़ हक़्क़ी

पाई न कोई मंज़िल पहुँचीं न कहीं राहें

शानुल हक़ हक़्क़ी

निकले तिरी दुनिया के सितम और तरह के

शानुल हक़ हक़्क़ी

हर-चंद कि साग़र की तरह जोश में रहिए

शानुल हक़ हक़्क़ी

इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई

शानुल हक़ हक़्क़ी

दुनिया ही की राह पे आख़िर रफ़्ता रफ़्ता आना होगा

शानुल हक़ हक़्क़ी

ऐ दिल अब और कोई क़िस्सा-ए-दुनिया न सुना

शानुल हक़ हक़्क़ी

ज़ब्त-ए-नावक-ए-ग़म से बात बन तो सकती है

शाद आरफ़ी

कभी तलाश न ज़ाए न राएगाँ होगी

शाद आरफ़ी

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