शोक Poetry (page 46)

होंटों पर महसूस हुई है आँखों से मादूम रही है

शाद आरफ़ी

ब-पास-ए-एहतियात-ए-आरज़ू ये बार-हा हुआ

शाद आरफ़ी

अहद-ए-मायूसी जहाँ तक साज़गार आता गया

शाद आरफ़ी

यही बस एक दुआ माँगना नहीं आता

सीन शीन आलम

शुऊर-ए-क़ैस ने सहरा में ख़ुद-कुशी कर ली

सीन शीन आलम

अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया

सीमान नवेद

यही ठहरा कि अब उस ओर जाना भी नहीं है

सीमाब ज़फ़र

कूचा-हा-ए-दिल-ओ-जाँ की तीरा-शबो आस मरती नहीं

सीमाब ज़फ़र

ख़िरद के जुमला दसातीर से मुकरते हुए

सीमाब ज़फ़र

जो अपने घर को का'बा मानते हैं

सीमाब ज़फ़र

मेहमाँ को घर में आए ज़माना गुज़र गया

सीमाब सुल्तानपुरी

किताब-ए-उम्र में इक वो भी बाब होता है

सीमाब सुल्तानपुरी

किस तरफ़ से आ रही हैं दर्द की पुरवाइयाँ

सीमाब सुल्तानपुरी

मैं तोड़ूँ अहद-ओ-पैमान-ए-वफ़ा ये हो नहीं सकता

सीमाब बटालवी

नशात-ए-हुस्न हो जोश-ए-वफ़ा हो या ग़म-ए-इश्क़

सीमाब अकबराबादी

सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री

सीमाब अकबराबादी

शुक्रिया हस्ती का! लेकिन तुम ने ये क्या कर दिया

सीमाब अकबराबादी

शायद जगह नसीब हो उस गुल के हार में

सीमाब अकबराबादी

रोज़-ए-फ़िराक़ हर तरफ़ इक इंतिशार था

सीमाब अकबराबादी

नाहक़ शिकायत-ए-ग़म-ए-दुनिया करे कोई

सीमाब अकबराबादी

न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे

सीमाब अकबराबादी

जो मेरे तंगना-ए-दिल में तुझ को जल्वा-गर देखा

सीमाब अकबराबादी

जल्वा-गाह-ए-दिल में मरते ही अँधेरा हो गया

सीमाब अकबराबादी

जब तक ग़म-ए-उल्फ़त का उंसुर न मिला होगा

सीमाब अकबराबादी

इश्क़ ख़ुद माइल-ए-हिजाब है आज

सीमाब अकबराबादी

इजाज़त दे कि अपनी दास्तान-ए-ग़म बयाँ कर लें

सीमाब अकबराबादी

हुस्न के दिल में जगह पाते ही दीवाना बने

सीमाब अकबराबादी

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

सीमाब अकबराबादी

अंजाम हर इक शय का ब-जुज़ ख़ाक नहीं है

सीमाब अकबराबादी

अब क्या बताऊँ मैं तिरे मिलने से क्या मिला

सीमाब अकबराबादी

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