शोक Poetry (page 44)

सर-ए-बज़्म मेरी नज़र से जब वो निगाह-ए-होश-रुबा मिली

शादाँ इंदौरी

सजे हैं हर तरफ़ बाज़ार ऐसा क्यूँ नहीं होता

शादाब उल्फ़त

वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई

शाद लखनवी

शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ

शाद लखनवी

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

नज़रों से गुलों की नौ-निहालो

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

क्या कहूँ ग़ुंचा-ए-गुल नीम-दहाँ है कुछ और

शाद लखनवी

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

ख़लिश-ए-ख़ार हो वहशत में कि ग़म टूट पड़े

शाद लखनवी

कहते हैं नाला-ए-हज़ीं सुन के

शाद लखनवी

जों सब्ज़ा रहे उगते ही पैरों के तले हम

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

जिस के हम बीमार हैं ग़म ने उसे भी राँदा है

शाद लखनवी

जी जाऊँ जो बंद नातिक़ा हो

शाद लखनवी

जान या दिल नज़्र करना चाहिए

शाद लखनवी

हम वो नालाँ हैं बोली-ठोली में

शाद लखनवी

ग़ैरों में हिना वो मल रहा है

शाद लखनवी

दुनिया में क़स्र-ओ-ऐवाँ बे-फ़ाएदा बनाया

शाद लखनवी

जफ़ा-शिआ'र भी हो कोई मेहरबाँ भी रहे

शाद बिलगवी

हाथ से हाथ मिला दिल से तबीअ'त न मिली

शाद बिलगवी

छुप-छुप के तू 'शाद' उस से मुलाक़ात करे है

शाद बिलगवी

जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गए

शाद अज़ीमाबादी

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा

शाद अज़ीमाबादी

ता-उम्र आश्ना न हुआ दिल गुनाह का

शाद अज़ीमाबादी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया

शाद अज़ीमाबादी

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