शोक Poetry (page 42)

पलकों से अपने भूले हुए ख़्वाब बाँध लें

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

निकल के घर से फिर इस तरह घर गए हम तुम

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-दौराँ वही समझते हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हम पे जिस तौर भी तुम चाहो नज़र कर देखो

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हमारे हाल-ए-ज़बूँ पर मलाल है कितना

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

कुछ नहीं लिक्खा हुआ फिर भी पढ़ा जाता है क्या

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

बनते बनते अपने पेच-ओ-ख़म बने

शाहीन अब्बास

मचलते रहते हैं बिस्तर पे ख़्वाब मेरे लिए

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

वो एक तू कि तिरे ग़म में इक जहाँ रोए

शहबाज़ ख़्वाजा

ये कार-ए-बे-समराँ मुझ से होने वाला नहीं

शहबाज़ ख़्वाजा

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

कड़े हैं हिज्र के लम्हात उस से कह देना

शहबाज़ ख़्वाजा

भटक रहे हैं ग़म-ए-आगही के मारे हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

दवाम

शहाब जाफ़री

ये महशर-ए-सोज़-ओ-साज़ क्या है

शहाब जाफ़री

रुत्बा-ए-दर्द को जब अपना हुनर पहुँचेगा

शहाब जाफ़री

दश्त-ए-ग़ुर्बत है तो वो क्यूँ हैं ख़फ़ा हम से बहुत

शहाब जाफ़री

भरा घर है कोई सहरा नहीं है

शहाब अशरफ़

इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो हो

शाह नियाज़ अहमद नियाज़

इक आबला था सो भी गया ख़ार-ए-ग़म से फट

शाह नसीर

यारो नहीं इतना मुझे क़ातिल ने सताया

शाह नसीर

उधर अब्र ले चश्म-ए-नम को चला

शाह नसीर

तू ज़िद से शब-ए-वस्ल न आया तो हुआ क्या

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

क्यूँ न कहें बशर को हम आतिश-ओ-आब ओ ख़ाक-ओ-बाद

शाह नसीर

जिस्म उस के ग़म में ज़र्द-अज़-ना-तवानी हो गया

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

ये किस के सोज़ का है बज़्म-ए-जाँ में इंतिज़ार ऐ दिल

शाह दीन हुमायूँ

क्यूँ मुश्त-ए-ख़ाक पर कोई दिल दाग़दार हो

शाह दीन हुमायूँ

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