घर Poetry (page 119)

तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

था एक साया सा पीछे पीछे जो मुड़ के देखा तो कुछ नहीं था

अख़्तर होशियारपुरी

शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते

अख़्तर होशियारपुरी

क़र्या-ए-जाँ से गुज़र कर हम ने ये देखा भी है

अख़्तर होशियारपुरी

पहले तो सोच के दोज़ख़ में जलाता है मुझे

अख़्तर होशियारपुरी

मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए

अख़्तर होशियारपुरी

मैं ने यूँ देखा उसे जैसे कभी देखा न था

अख़्तर होशियारपुरी

मैं उस का नाम घुले पानियों पे लिखता क्या

अख़्तर होशियारपुरी

क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था

अख़्तर होशियारपुरी

कुछ नक़्श हुवैदा हैं ख़यालों की डगर से

अख़्तर होशियारपुरी

ख़्वाहिशें इतनी बढ़ीं इंसान आधा रह गया

अख़्तर होशियारपुरी

होंटों पे क़र्ज़-ए-हर्फ़-ए-वफ़ा उम्र भर रहा

अख़्तर होशियारपुरी

दश्त-दर-दश्त अक्स-ए-दर है यहाँ

अख़्तर होशियारपुरी

बारहा ठिठका हूँ ख़ुद भी अपना साया देख कर

अख़्तर होशियारपुरी

बजा कि दुश्मन-ए-जाँ शहर-ए-जाँ के बाहर है

अख़्तर होशियारपुरी

अपना साया भी न हम-राह सफ़र में रखना

अख़्तर होशियारपुरी

चाहो तो मिरा दुख मिरा आज़ार न समझो

अख़तर बस्तवी

आफ़तों में घिर गया हूँ ज़ीस्त से बे-ज़ार हूँ

अख़्तर अंसारी

ज़िंदगी की तेज़ इतनी अब रवानी हो गई

अख़्तर अमान

ये दिल कहता है कोई आ रहा है

अख़्तर अमान

यहाँ मौसम भी बदलें तो नज़ारे एक जैसे हैं

अख़्तर अमान

मैं परेशाँ हूँ मिलें चंद निवाले कैसे

अख़लाक़ बन्दवी

अभी अश्कों में ख़ूँ शामिल नहीं है

अख़लाक़ बन्दवी

वह शक्ल वह शनाख़्त वह पैकर की आरज़ू

अखिलेश तिवारी

किसे जाना कहाँ है मुनहसिर होता है इस पर भी

अखिलेश तिवारी

मैं किसी और ही आलम का मकीं हूँ प्यारे

अकबर मासूम

ये सारे फूल ये पत्थर उसी से मिलते हैं

अकबर मासूम

ये जो इक शाख़ है हरी थी अभी

अकबर मासूम

ख़ुद से निकलूँ भी तो रस्ता नहीं आसान मिरा

अकबर मासूम

अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है

अकबर मासूम

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