घर Poetry (page 117)

करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे

अलीम अफ़सर

मैं जब भी घर से निकलता हूँ रात को तन्हा

आलमताब तिश्ना

उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा

आलमताब तिश्ना

सिवाए-दर-ब-दरी उस को ख़ाक मिलता है

आलमताब तिश्ना

आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला

आलमताब तिश्ना

इस फ़ैसले से ख़ुश हैं अफ़राद घर के सारे

आलम ख़ुर्शीद

चारों तरफ़ हैं शोले हम-साए जल रहे हैं

आलम ख़ुर्शीद

अब कितनी कार-आमद जंगल में लग रही है

आलम ख़ुर्शीद

याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द

आलम ख़ुर्शीद

मिरे हिसार से बाहर बुला रहा है मुझे

आलम ख़ुर्शीद

क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ

आलम ख़ुर्शीद

जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी

आलम ख़ुर्शीद

हर घर में कोई तह-ख़ाना होता है

आलम ख़ुर्शीद

कोई इल्ज़ाम मेरे नाम मेरे सर नहीं आया

अकरम नक़्क़ाश

चढ़े हुए हैं जो दरिया उतर भी जाएँगे

अकरम महमूद

पड़ गई जैसे अक़्ल पर मिट्टी

अकमल इमाम

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

ख़मीर

अख़्तर-उल-ईमान

काले सफ़ेद परों वाला परिंदा और मेरी एक शाम

अख़्तर-उल-ईमान

बुलावा

अख़्तर-उल-ईमान

शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे

अख़्तर उस्मान

मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ

अख्तर शुमार

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

अख्तर शुमार

ओ देस से आने वाले बता

अख़्तर शीरानी

नन्हा क़ासिद

अख़्तर शीरानी

मुझे ले चल

अख़्तर शीरानी

जहाँ 'रेहाना' रहती थी

अख़्तर शीरानी

बदनाम हो रहा हूँ

अख़्तर शीरानी

ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

अख़्तर शीरानी

किस की आँखों का लिए दिल पे असर जाते हैं

अख़्तर शीरानी

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