घर Poetry (page 120)

लुटाऊँ मस्तियाँ सरसब्ज़ रहगुज़र की तरह

अकबर काज़मी

रस्ते ही में हो जाती हैं बातें बस दो-चार

अकबर हैदराबादी

सितम-ज़दा कई बशर क़दम क़दम पे थे

अकबर हैदराबादी

जिन के नसीब में आब-ओ-दाना कम कम होता है

अकबर हैदराबादी

जब सुब्ह की दहलीज़ पे बाज़ार लगेगा

अकबर हैदराबादी

हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था

अकबर हैदराबादी

घुटन अज़ाब-ए-बदन की न मेरी जान में ला

अकबर हैदराबादी

बदन से रिश्ता-ए-जाँ मो'तबर न था मेरा

अकबर हैदराबादी

नाम 'अकबर' तो मिरा माँ की दुआ ने रक्खा

अकबर हमीदी

हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-अय्याम तो बने हुए हैं

अकबर हमीदी

सिधारें शैख़ काबा को हम इंग्लिस्तान देखेंगे

अकबर इलाहाबादी

हुए इस क़दर मोहज़्ज़ब कभी घर का मुँह न देखा

अकबर इलाहाबादी

अक़्ल में जो घिर गया ला-इंतिहा क्यूँकर हुआ

अकबर इलाहाबादी

दरबार1911

अकबर इलाहाबादी

ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे

अकबर इलाहाबादी

उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़

अकबर इलाहाबादी

उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है

अकबर इलाहाबादी

नई तहज़ीब से साक़ी ने ऐसी गर्म-जोशी की

अकबर इलाहाबादी

जब यास हुई तो आहों ने सीने से निकलना छोड़ दिया

अकबर इलाहाबादी

दिल हो ख़राब दीन पे जो कुछ असर पड़े

अकबर इलाहाबादी

ये तन घिरा हुआ छोटे से घर में रहता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे

अकबर अली खान अर्शी जादह

कभी ज़ख़्म ज़ख़्म निखर के देख कभी दाग़ दाग़ सँवर के देख

अकबर अली खान अर्शी जादह

वही बे-बाकी-ए-उश्शाक़ है दरकार अब भी

अजमल सिराज

दीवार याद आ गई दर याद आ गया

अजमल सिराज

मेरे साथ सु-ए-जुनून चल मिरे ज़ख़्म खा मिरा रक़्स कर

अजमल सिद्दीक़ी

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

अजमल सिद्दीक़ी

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो

अजमल अजमली

वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ

अजमल अजमली

दो पल के हैं ये सब मह ओ अख़्तर न भूलना

अजमल अजमली

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