घर Poetry (page 121)

आज़ार बहुत लज़्ज़त-ए-आज़ार बहुत है

अजमल अजमली

इंसान हादसात से कितना क़रीब है

आजिज़ मातवी

मय-ख़ाने पर काले बादल जब घिर घिर कर आते हैं

आजिज़ मातवी

हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम

आजिज़ मातवी

हंगामा क्यूँ बपा है ज़रा बाम पर से देख

आजिज़ मातवी

लब-ए-दरिया जो प्यासे मर गए हैं

अजीत सिंह हसरत

जब मेरा घर बहिश्त सी गुल-वादियों में था

अजीत सिंह हसरत

इश्क़ जन्मों का है सफ़र शायद

अजीत सिंह हसरत

गुज़रे जिधर से नूर बिखेरे चले गए

अजीत सिंह हसरत

शाम आई है लिए हाथ में यादों के चराग़

अजय सहाब

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए

ऐतबार साजिद

तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है

ऐतबार साजिद

कहा दिन को भी ये घर किस लिए वीरान रहता है

ऐतबार साजिद

जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो

ऐतबार साजिद

आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

ज़ुल्मतों में गो ठहरने को ठहर जाते हैं लोग

ऐश बर्नी

वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

ऐनुद्दीन आज़िम

मैं ने जब हद से गुज़रने का इरादा कर लिया

ऐनुद्दीन आज़िम

जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ऐन ताबिश

रात अभी आधी गुज़री है

ऐन ताबिश

बदलने का कोई मौसम नहीं होता

ऐन ताबिश

ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए

ऐन ताबिश

जी रहे हैं आफ़ियत में तो हुनर ख़्वाबों का है

ऐन ताबिश

नज़्म

ऐन रशीद

तन्हा तन्हा सहमी सहमी ख़ामोशी

ऐन इरफ़ान

आहों की आज़ारों की आवाज़ें थीं

ऐन इरफ़ान

जहाँ शीशा है पत्थर जागते हैं

अहसन यूसुफ़ ज़ई

घर घर आपस में दुश्मनी भी है

अहसन यूसुफ़ ज़ई

रोक ले ऐ ज़ब्त जो आँसू के चश्म-ए-तर में है

अहसन मारहरवी

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