घर Poetry (page 123)

जिस जगह आगही मुक़य्यद है

अहमद सज्जाद बाबर

दियों से वा'दे वो कर रही थी अजीब रुत थी

अहमद सज्जाद बाबर

बुझती हुई आँखों का अकेला वो दिया था

अहमद सज्जाद बाबर

तख़्लीक़ ख़ुद किया था कल अपने में एक घर

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

सारी दुनिया से अलग वहशत-ए-दिल है अपनी

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

हैं शाख़ शाख़ परेशाँ तमाम घर मेरे

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

और सी धूप घटा और सी रक्खी हुई है

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

अहमद नदीम क़ासमी

रेस्तोराँ

अहमद नदीम क़ासमी

बीसवीं सदी का इंसान

अहमद नदीम क़ासमी

अज़ली मसर्रतों की अज़ली मंज़िल

अहमद नदीम क़ासमी

मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

अहमद नदीम क़ासमी

जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

अहमद नदीम क़ासमी

पता अब तक नहीं बदला हमारा

अहमद मुश्ताक़

पता अब तक नहीं बदला हमारा

अहमद मुश्ताक़

कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया

अहमद मुश्ताक़

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम

अहमद मुश्ताक़

सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'

अहमद महफ़ूज़

हम को आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब

अहमद महफ़ूज़

सवाद-ए-शाम न रंग-ए-सहर को देखते हैं

अहमद महफ़ूज़

फेंकते संग-ए-सदा दरिया-ए-वीरानी में हम

अहमद महफ़ूज़

लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का

अहमद महफ़ूज़

ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था

अहमद ख़याल

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