घर Poetry (page 125)

अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जाएँगे

अहमद हमदानी

उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है

अहमद फ़राज़

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे

अहमद फ़राज़

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

अहमद फ़राज़

हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद

अहमद फ़राज़

मुहासरा

अहमद फ़राज़

ख़्वाबों के ब्योपारी

अहमद फ़राज़

कर गए कूच कहाँ

अहमद फ़राज़

बन-बास

अहमद फ़राज़

ये बे-दिली है तो कश्ती से यार क्या उतरें

अहमद फ़राज़

वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ

अहमद फ़राज़

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

सभी कहें मिरे ग़म-ख़्वार के अलावा भी

अहमद फ़राज़

सब लोग लिए संग-ए-मलामत निकल आए

अहमद फ़राज़

रात के पिछले पहर रोने के आदी रोए

अहमद फ़राज़

क़ुर्ब-ए-जानाँ का न मय-ख़ाने का मौसम आया

अहमद फ़राज़

कल हम ने बज़्म-ए-यार में क्या क्या शराब पी

अहमद फ़राज़

जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए

अहमद फ़राज़

इश्क़ नश्शा है न जादू जो उतर भी जाए

अहमद फ़राज़

हवा के ज़ोर से पिंदार-ए-बाम-ओ-दर भी गया

अहमद फ़राज़

गुमाँ यही है कि दिल ख़ुद उधर को जाता है

अहमद फ़राज़

गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा

अहमद फ़राज़

अजब जुनून-ए-मसाफ़त में घर से निकला था

अहमद फ़राज़

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो

अहमद फ़राज़

सदियों के अँधेरे में उतारा करे कोई

अहमद फ़क़ीह

ऐ शाम-ए-हिज्र-ए-यार मिरी तू गवाही दे

अहमद अज़ीम

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया

अहमद अज़ीम

सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से

अहमद अशफ़ाक़

वफ़ा कम है नज़र आती बहुत है

अहमद अल्वी

मैं सोज़-ए-दरूँ अपना दिखा भी नहीं सकता

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

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