घर Poetry (page 124)

रफ़ाक़तों का तवाज़ुन अगर बिगड़ जाए

अहमद कमाल परवाज़ी

मिरी आदत मुझे पागल नहीं होने देती

अहमद कमाल परवाज़ी

ज़रा ज़रा सी कई कश्तियाँ बना लेना

अहमद कमाल परवाज़ी

रौशनी साँस ही ले ले तो ठहर जाता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

दिल-ए-बेताब के हमराह सफ़र में रहना

अहमद जावेद

सबा देख इक दिन इधर आन कर के

अहमद जावेद

मुझ से बड़ा है मेरा हाल

अहमद जावेद

क्या पूछते हो शहर में घर और हमारा

अहमद जावेद

हमारी हम-नफ़सी को भी क्या दवाम हुआ

अहमद जावेद

दिल-ए-बेताब के हमराह सफ़र में रहना

अहमद जावेद

दिल आईना है मगर इक निगाह करने को

अहमद जावेद

चाक करते हैं गरेबाँ इस फ़रावानी से हम

अहमद जावेद

अच्छी गुज़र रही है दिल-ए-ख़ुद-कफ़ील से

अहमद जावेद

तौबा खड़ी है दर पे जो फ़रियाद के लिए

अहमद हुसैन माइल

क्या आई थीं हूरें तिरे घर रात को मेहमाँ

अहमद हुसैन माइल

कुछ न पूछो ज़ाहिदों के बातिन ओ ज़ाहिर का हाल

अहमद हुसैन माइल

शब-ए-माह में जो पलंग पर मिरे साथ सोए तो क्या हुए

अहमद हुसैन माइल

रू-ए-ताबाँ माँग मू-ए-सर धुआँ बत्ती चराग़

अहमद हुसैन माइल

कोई हसीन है मुख़्तार-ए-कार-ख़ाना-ए-इश्क़

अहमद हुसैन माइल

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

रास्ते में शाम का मुक़द्दर होना

अहमद हमेश

अपने जैसे आशिक़ों के नाम

अहमद हमेश

अंदेशा-ए-जाँ

अहमद हमेश

आख़िरी मुकालिमा

अहमद हमेश

न घर है कोई न सामान कुछ रहा बाक़ी

अहमद हमेश

किस तवक़्क़ो' पे क्या उठा रखिए

अहमद हमेश

अजीब वहशतें हिस्से में अपने आई हैं

अहमद हमदानी

मुँह अँधेरे घर से निकले फिर थे हंगामे बहुत

अहमद हमदानी

ख़याल-ओ-ख़्वाब से घर कब तलक सजाएँ हम

अहमद हमदानी

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