घर Poetry (page 85)

शहर का मंज़र हमारे घर के पस-ए-मंज़र में है

फ़ारूक़ शफ़क़

फूलों को वैसे भी मुरझाना है मुरझाएँगे

फ़ारूक़ शफ़क़

पौ फटी एक ताज़ा कहानी मिली

फ़ारूक़ शफ़क़

खिड़कियों पर मल्गजे साए से लहराने लगे

फ़ारूक़ शफ़क़

होने वाला था इक हादसा रह गया

फ़ारूक़ शफ़क़

धीरे धीरे शाम का आँखों में हर मंज़र बुझा

फ़ारूक़ शफ़क़

छाँव की शक्ल धूप की रंगत बदल गई

फ़ारूक़ शफ़क़

आप की तस्वीर थी अख़बार में

फ़ारूक़ नाज़की

नींद क्यूँ नहीं आती

फ़ारूक़ नाज़की

बचपन

फ़ारूक़ नाज़की

रंग ख़ाके में नया भर दूँगा मैं

फ़ारूक़ नाज़की

पूरे क़द से मैं खड़ा हूँ सामने आएगा क्या

फ़ारूक़ नाज़की

फिर पहाड़ों से उतर कर आएँगे

फ़ारूक़ नाज़की

जूँही बाम-ओ-दर जागे

फ़ारूक़ नाज़की

हिसार-ए-जिस्म से आगे निकल गया होता

फ़ारूक़ नाज़की

गहरी नीली शाम का मंज़र लिखना है

फ़ारूक़ नाज़की

यूँ हुजरा-ए-ख़याल में बैठा हुआ हूँ मैं

फ़ारूक़ मुज़्तर

सोच भी उस दिन को जब तू ने मुझे सोचा न था

फ़ारूक़ मुज़्तर

अपनी आँखों के हिसारों से निकल कर देखना

फ़ारूक़ मुज़्तर

तुम्हारे क़स्र-आज़ादी के मेमारों ने क्या पाया

फ़ारूक़ बाँसपारी

ख़ुदा करे कि ये मिट्टी बिखर भी जाए अब

फ़ारूक़ बख़्शी

कैसे इन सच्चे जज़्बों की अब उस तक तफ़्हीम करूँ

फ़ारूक़ बख़्शी

इक पल कहीं रुके थे सफ़र याद आ गया

फ़ारूक़ बख़्शी

परिंदे खेत में अब तक पड़ाव डाले हैं

फ़ारूक़ अंजुम

मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं

फ़ारूक़ अंजुम

जंग में जाएगा अब मेरा ही सर जान गया

फ़ारूक़ अंजुम

अब धूप मुक़द्दर हुई छप्पर न मिलेगा

फ़ारूक़ अंजुम

इस क़दर महव-ए-तसव्वुर हूँ सितमगर तेरा

फ़रोग़ हैदराबादी

दिल नहीं मिलने का फिर मेरा सितमगर टूट कर

फ़रोग़ हैदराबादी

एक पुराना ख़्वाब

फरीहा नक़वी

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