गुल Poetry (page 86)

पत्थर

अहमद नदीम क़ासमी

ढलान

अहमद नदीम क़ासमी

बीसवीं सदी का इंसान

अहमद नदीम क़ासमी

वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे

अहमद नदीम क़ासमी

तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा

अहमद नदीम क़ासमी

साँस लेना भी सज़ा लगता है

अहमद नदीम क़ासमी

मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे

अहमद नदीम क़ासमी

लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा

अहमद नदीम क़ासमी

जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे

अहमद नदीम क़ासमी

दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने

अहमद नदीम क़ासमी

अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था

अहमद नदीम क़ासमी

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की

अहमद नदीम क़ासमी

हमारा क्या है जो होता है जी उदास बहुत

अहमद मुश्ताक़

ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

ले के हम-राह छलकते हुए पैमाने को

अहमद मुश्ताक़

कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में

अहमद मुश्ताक़

कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है

अहमद मुश्ताक़

हम गिरे हैं जो आ के इतनी दूर

अहमद मुश्ताक़

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़

दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार

अहमद मासूम

रक़्स-ए-शरर क्या अब के वहशत-नाक हुआ

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

बदन-सराब न दरिया-ए-जाँ से मिलता है

अहमद महफ़ूज़

फूल पर ओस का क़तरा भी ग़लत लगता है

अहमद कमाल परवाज़ी

उस के लहजे का वो उतार चढ़ाओ

अहमद जावेद

सबा देख इक दिन इधर आन कर के

अहमद जावेद

कोई जल में ख़ुश है कोई जाल में

अहमद जावेद

गए थे वहाँ जी में क्या ठान कर के

अहमद जावेद

ज़मज़मा नाला-ए-बुलबुल ठहरे

अहमद हुसैन माइल

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