हाथ Poetry (page 17)

देखो फ़िराक़-ए-यार में जाँ खो रहा है वो

शहज़ाद रज़ा लम्स

फिर से वही हालात हैं इम्काँ भी वही है

शहपर रसूल

मोम की गुड़िया

शीरीं अहमद

कई शक्लों में ख़ुद को सोचता है

शीन काफ़ निज़ाम

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता

शाज़ तमकनत

मिरे नसीब ने जब मुझ से इंतिक़ाम लिया

शाज़ तमकनत

मैं तो चुप था मगर उस ने भी सुनाने न दिया

शाज़ तमकनत

ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा

शाज़ तमकनत

सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से

शायान क़ुरैशी

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया

शौक़ क़िदवाई

भागे अच्छी शक्लों वाले इश्क़ है गोया काम बुरा

शौक़ क़िदवाई

बाक़ी न रहे होश जुनूँ ऐसा हुआ तेज़

शौक़ माहरी

ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से ये नुमायाँ है ग़ालिबन

शौक़ बहराइची

ये ख़बर आई है आज इक मुर्शिद-ए-अकमल के पास

शौक़ बहराइची

न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है

शौक़ बहराइची

देखते हैं जब कभी ईमान में नुक़सान शैख़

शौक़ बहराइची

ऐ हम-सफ़ीर तलख़ी-ए-तर्ज़-ए-बयाँ न छोड़

शौक़ बहराइची

आँसू मिरी आँखों से टपक जाए तो क्या हो

शौक़ बहराइची

आटा

शौकत थानवी

ग़म की अँधेरी राहों में तो तुम भी नहीं काम आओ हो

शौकत परदेसी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है

शारिक़ कैफ़ी

मश्क़

शारिक़ कैफ़ी

इबादत के वक़्त में हिस्सा

शारिक़ कैफ़ी

दूसरे हाथ का दुख

शारिक़ कैफ़ी

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

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