हाथ Poetry (page 16)

गुज़र जाएँगे ये दिन बेबसी के

शोभा कुक्कल

रात का तारीक-तर पत्थर जिगर पानी करें

शोएब निज़ाम

मिल गया जब वो नगीं फिर ख़ूबी-ए-तक़दीर से

शोएब निज़ाम

नाला-ए-दिल की सदा दीवार में है दर में है

शोएब अहमद मेरठी नुद्रत

दिलों को तोड़ने वालो ख़ुदा का ख़ौफ़ करो

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

जिस तरफ़ हाल-ए-जुनूँ में तेरे दीवाने गए

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

हवस का दाम फैलाया हुआ है

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

कसरत-ए-वहदानियत में हुस्न की तनवीर देख

शेर सिंह नाज़ देहलवी

यूसुफ़ ही ज़र-ख़रीदों में फ़िरोज़-बख़्त था

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

पहुँचा है आज क़ैस का याँ सिलसिला मुझे

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

ज़ौक़

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

ज़ौक़

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में

ज़ौक़

दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से

ज़ौक़

बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई

ज़ौक़

बलाएँ आँखों से उन की मुदाम लेते हैं

ज़ौक़

बाग़-ए-आलम में जहाँ नख़्ल-ए-हिना लगता है

ज़ौक़

बादाम दो जो भेजे हैं बटवे में डाल कर

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

क्या क्या न तेरे सदमे से बाद-ए-ख़िज़ाँ गिरा

शैख़ अली बख़्श बीमार

ये काएनात तिरा मोजज़ा लगे है मुझे

शहज़ाद रज़ा लम्स

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