हाथ Poetry (page 35)

रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है

रऊफ़ ख़ैर

गिरफ़्तारी के सब हरबे शिकारी ले के निकला है

रऊफ़ ख़ैर

धरती से दूर हैं न क़रीब आसमाँ से हम

रऊफ़ ख़ैर

बिकती नहीं फ़क़ीर की झोली ही क्यूँ न हो

रऊफ़ ख़ैर

आँखों प अभी तोहमत-ए-बीनाई कहाँ है

रऊफ़ ख़ैर

मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी

रतन पंडोरवी

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

रतन पंडोरवी

साया सा इक ख़याल की पहनाइयों में था

रासिख़ इरफ़ानी

किसी दराज़ में रखना कि ताक़ पर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

महफ़िल में तो बस वो सज रहा है

राशिद मुफ़्ती

किसी की जीत का सदमा किसी की मात का बोझ

राशिद मुफ़्ती

तब्दीली

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

मौसम के मुताबिक़ कोई सामाँ भी नहीं है

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

ये न सोचा था कड़ी धूप से रिश्ता भी तो है

राशिद अनवर राशिद

वो और लोग थे जो रास्ते बदलते रहे

राशिद अनवर राशिद

ख़िलाफ़ सारी लकीरें थीं हाथ मलते क्या

राशिद अनवर राशिद

शहर से कोई मज़ाफ़ात में आया हुआ था

राशिद अमीन

पत्थर पड़े हुए कहीं रस्ता बना हुआ

राशिद अमीन

तजज़िया

राशिद आज़र

फ़ासला रक्खो ज़रा अपनी मुदारातों के बीच

राशिद आज़र

आइने से मुकर गया कोई

राशिद आज़र

रुके हुए हैं जो दरिया उन्हें रवानी दे

रशीदुज़्ज़फ़र

है निहायत सख़्त शान-ए-इम्तिहान-ए-कू-ए-दोस्त

रशीद रामपुरी

यूँ भी इक बज़्म-ए-सदा हम ने सजाई पहरों

रशीद क़ैसरानी

तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा

रशीद क़ैसरानी

तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा

रशीद क़ैसरानी

नाम हमारा दुनिया वाले लिखेंगे जी-दारों में

रशीद क़ैसरानी

मिरी जबीं का मुक़द्दर कहीं रक़म भी तो हो

रशीद क़ैसरानी

मेरे लिए तो हर्फ़-ए-दुआ हो गया वो शख़्स

रशीद क़ैसरानी

मैं ने कहीं थीं आप से बातें भली भली

रशीद क़ैसरानी

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