हाथ Poetry (page 33)
मर कर अरे वाइज़ कोई ज़िंदा नहीं होता
रियाज़ ख़ैराबादी
ले गया घर से उन्हें ग़ैर के घर का ता'वीज़
रियाज़ ख़ैराबादी
जोबन उन का उठान पर कुछ है
रियाज़ ख़ैराबादी
जो थे हाथ मेहंदी लगाने के क़ाबिल
रियाज़ ख़ैराबादी
जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी
रियाज़ ख़ैराबादी
जी उठे हश्र में फिर जी से गुज़रने वाले
रियाज़ ख़ैराबादी
जाने वाले न हम उस कूचे में आने वाले
रियाज़ ख़ैराबादी
होगी वो दिल में जो ठानी जाएगी
रियाज़ ख़ैराबादी
गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के
रियाज़ ख़ैराबादी
पाँव के हाथ से गर्दिश ही रही मुझ को मुदाम
रिन्द लखनवी
क्या सुन चुके हैं आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार हाथ
रिन्द लखनवी
हिज्र की शब हाथ में ले कर चराग़-ए-माहताब
रिन्द लखनवी
मुझे दे के दिल जान खोना पड़ा है
रिन्द लखनवी
मुझ बला-नोश को तलछट भी है काफ़ी साक़ी
रिन्द लखनवी
क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए
रिन्द लखनवी
जलन दिल की लिक्खें जो हम दिल-जले
रिन्द लखनवी
गले लगाएँ बलाएँ लें तुम को प्यार करें
रिन्द लखनवी
छुप के घर ग़ैर के जाया न करो
रिन्द लखनवी
चलती रही उस कूचे में तलवार हमेशा
रिन्द लखनवी
चढ़ी तेरे बीमार-ए-फ़ुर्क़त को तब है
रिन्द लखनवी
आफ़त शब-ए-तन्हाई की टल जाए तो अच्छा
रिन्द लखनवी
न फूल हूँ न सितारा हूँ और न शो'ला हूँ
रिफ़अत सरोश
रात दिन महबूस अपने ज़ाहिरी पैकर में हूँ
रियाज़ मजीद
मकान-ए-दिल से जो उठता था वो धुआँ भी गया
रियाज़ मजीद
बदल सका न जुदाई के ग़म उठा कर भी
रियाज़ मजीद
शीशा-सिफ़त थे आप और शीशा-सिफ़त थे हम
रेनू नय्यर
जागती आँखों का ख़्वाब
रहमान फ़ारिस
मैं ने तुम्हें चलना सिखाया था
रेहाना रूही
कौन कहाँ तक जा सकता है
रेहाना रूही
दिल को रह रह के ये अंदेशे डराने लग जाएँ
रेहाना रूही
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