हाथ Poetry (page 32)
फूल बिखराती हर इक मौज-ए-हवा आती है
साबिर दत्त
तू नहीं है तो मिरी शाम अकेली चुप है
सबीहा सबा, पाकिस्तान
ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे
सबिहा सबा, न्यूयार्क
शाख़ों पर जब पत्ते हिलने लगते हैं
सबा नुसरत
अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है
सबा अकबराबादी
वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं
साइल देहलवी
उड़ा सकता नहीं कोई मिरे अंदाज़-ए-शेवन को
साइल देहलवी
ख़िज़ाँ का जो गुलशन से पड़ जाए पाला
साइल देहलवी
हक़-ओ-नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना
साइल देहलवी
वो भी बिगड़ा, हुई रुस्वाई भी
सादुल्लाह शाह
अपनी मर्ज़ी ही करोगे तुम भी
रूही कंजाही
था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को
रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान
इसी लिबास इसी पैरहन में रहना है
रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान
चहार सम्त से कल तक जो घर दमकता था
रिज़्वानुल्लाह
सब ख़लाओं को ख़लाओं से भिगो सकता है
रियाज़ लतीफ़
किसी बे-घर जहाँ का राज़ होना चाहिए था
रियाज़ लतीफ़
नासेह के सर पर एक लगाई तड़ाक़ से
रियाज़ ख़ैराबादी
ख़ुदा के हाथ है बिकना न बिकना मय का ऐ साक़ी
रियाज़ ख़ैराबादी
है भी कुछ या नहीं मैं हाथ लगा कर देखूँ
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़िद हमारी दुआ से होती है
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़रूर पाँव में अपने हिना वो मल के चले
रियाज़ ख़ैराबादी
ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं
रियाज़ ख़ैराबादी
ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का
रियाज़ ख़ैराबादी
वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों
रियाज़ ख़ैराबादी
वा'दा था जिस का हश्र में वो बात भी तो हो
रियाज़ ख़ैराबादी
थका ले और दौर-ए-आसमाँ तक
रियाज़ ख़ैराबादी
'रियाज़' इक चुलबुला सा दिल हो हम हों
रियाज़ ख़ैराबादी
परा बाँधे सफ़-ए-मिज़्गाँ खड़ी है
रियाज़ ख़ैराबादी
मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद
रियाज़ ख़ैराबादी
मुझ को लेना है तिरे रंग-ए-हिना का बोसा
रियाज़ ख़ैराबादी
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