हाथ Poetry (page 52)

तह-ए-बदन कहीं बेदार होता जाता हूँ

फ़रहत एहसास

मुसलसल अश्क-बारी हो रही है

फ़रहत एहसास

मिला है जिस्म कि उस का गुमाँ मिला है मुझे

फ़रहत एहसास

ख़िलाफ़-ए-गर्दिश-ए-मा'मूल होना चाहता हूँ

फ़रहत एहसास

ईमाँ का लुत्फ़ पहलू-ए-तश्कीक में मिला

फ़रहत एहसास

हद्द-ए-बदन में मेरी ज़ात आ नहीं रही है

फ़रहत एहसास

आया ज़रा सी देर रहा ग़ुल गया बदन

फ़रहत एहसास

ख़याल आतिशीं ख़्वाबीदा सूरतें दी हैं

फ़रहत अब्बास

जब भी शम-ए-तरब जलाई है

फ़रीद जावेद

बिछड़ते दामनों में अपनी कुछ परछाइयाँ रख दो

फ़राज़ सुल्तानपूरी

सारे मंज़र दिलकश थे हर बात सुहानी लगती थी

फ़रह इक़बाल

मोहब्बत का दिया ऐसे बुझा था

फ़रह इक़बाल

देखा पलट के जब भी तो फैला ग़ुबार था

फ़रह इक़बाल

नवाह-ए-जाँ में किसी के उतरना चाहा था

फ़राग़ रोहवी

कभी यक़ीं से हुई और कभी गुमाँ से हुई

फ़राग़ रोहवी

हमारे साथ उमीद-ए-बहार तुम भी करो

फ़राग़ रोहवी

दिन में भी हसरत-ए-महताब लिए फिरते हैं

फ़राग़ रोहवी

दयार-ए-शब का मुक़द्दर ज़रूर चमकेगा

फ़राग़ रोहवी

जिस्म में गूँजता है रूह पे लिक्खा दुख है

फ़क़ीह हैदर

फ़ानी दवा-ए-दर्द-ए-जिगर ज़हर तो नहीं

फ़ानी बदायुनी

क़िस्सा-ए-ज़ीस्त मुख़्तसर करते

फ़ानी बदायुनी

कुछ बस ही न था वर्ना ये इल्ज़ाम न लेते

फ़ानी बदायुनी

इब्तिदा-ए-इश्क़ है लुत्फ़-ए-शबाब आने को है

फ़ानी बदायुनी

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

फ़ानी बदायुनी

वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्मसार हुआ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

साक़िया तू ने मिरे ज़र्फ़ को समझा क्या है

फ़ना निज़ामी कानपुरी

तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जा

फ़ना बुलंदशहरी

मज़दूर औरतें

फख्र ज़मान

मुश्किल से चमन में हमें एक बार मिला फूल

फख्र ज़मान

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

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