हाथ Poetry (page 68)

मिरे अश्क भी हैं इस में ये शराब उबल न जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

बड़े सुकून से ख़ुद अपने हम-सरों में रहे

अनवर मीनाई

सोचना रूह में काँटे से बिछाए रखना

अनवर मसूद

क्यूँ किसी और को दुख दर्द सुनाऊँ अपने

अनवर मसूद

इशारतों की वो शर्हें वो तज्ज़िया भी गया

अनवर मसूद

इस इब्तिदा की सलीक़े से इंतिहा करते

अनवर मसूद

न जाने क्यूँ अधूरी ही मुझे तस्वीर जचती है

अनवर जलालपुरी

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ

अनवर जलालपुरी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

ज़मीन हाँपने लगती है इक जगह रुक कर

अंजुम सलीमी

ये भी आग़ाज़-ए-मोहब्बत में बहुत है मुझ को

अंजुम सलीमी

पुर्सा

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

हवा का तख़्त बिछाता हूँ रक़्स करता हूँ

अंजुम सलीमी

दीवार पे रक्खा तो सितारे से उठाया

अंजुम सलीमी

चराग़ हाथ में हो तो हवा मुसीबत है

अंजुम सलीमी

चला हवस के जहानों की सैर करता हुआ

अंजुम सलीमी

आईना साफ़ था धुँदला हुआ रहता था मैं

अंजुम सलीमी

जब भी कोई बात की आँसू ढलके साथ

अंजुम रूमानी

तुम्हारी पोरों का लम्स अब तक.....

अंजुम ख़लीक़

जो न हों कुछ तशरीह-तलब कम होते हैं

अंजुम इरफ़ानी

धूप आती नहीं रुख़ अपना बदल कर देखें

अंजुम इरफ़ानी

अनजाने ख़्वाब की ख़ातिर क्यूँ चैन गँवाया

अंजुम अंसारी

उस बुत को ज़रा छू के तो देखें कि वो क्या है

अनजुम अब्बासी

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