हुआ Poetry (page 132)

माँ

हबीब जालिब

जम्हूरियत

हबीब जालिब

बगिया लहूलुहान

हबीब जालिब

अहद-ए-सज़ा

हबीब जालिब

उस गली के लोगों को मुँह लगा के पछताए

हबीब जालिब

तू रंग है ग़ुबार हैं तेरी गली के लोग

हबीब जालिब

फिर कभी लौट कर न आएँगे

हबीब जालिब

फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल

हबीब जालिब

न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में

हबीब जालिब

लोग गीतों का नगर याद आया

हबीब जालिब

कम पुराना बहुत नया था फ़िराक़

हबीब जालिब

इस शहर-ए-ख़राबी में ग़म-ए-इश्क़ के मारे

हबीब जालिब

इस शहर-ए-ख़राबी में ग़म-ए-इश्क़ के मारे

हबीब जालिब

दिल-ए-पुर-शौक़ को पहलू में दबाए रक्खा

हबीब जालिब

बड़े बने थे 'जालिब' साहब पिटे सड़क के बीच

हबीब जालिब

और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना

हबीब जालिब

और सब भूल गए हर्फ़ सदाक़त लिखना

हबीब जालिब

तीरा-बख़्ती की बला से यूँ निकलना चाहिए

हबीब मूसवी

क्या हुआ वीराँ किया गर मोहतसिब ने मय-कदा

हबीब मूसवी

फ़स्ल-ए-गुल आई उठा अब्र चली सर्द हुआ

हबीब मूसवी

दिल में भरी है ख़ाक में मिलने की आरज़ू

हबीब मूसवी

वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए

हबीब मूसवी

क़त्अ होता रहे इस तरह बयान-ए-वाइज़

हबीब मूसवी

लैस हो कर जो मिरा तर्क-ए-जफ़ा-कार चले

हबीब मूसवी

जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा

हबीब मूसवी

हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है

हबीब मूसवी

है निगहबाँ रुख़ का ख़ाल-रू-ए-दोस्त

हबीब मूसवी

है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़

हबीब मूसवी

गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट

हबीब मूसवी

फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है

हबीब मूसवी

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