हुआ Poetry (page 134)

कोई अटका हुआ है पल शायद

गुलज़ार

कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे

गुलज़ार

गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं

गुलज़ार

ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता

गुलज़ार

याद नहीं है

गुलनाज़ कौसर

मैं नहीं हूँ मगर

गुलनाज़ कौसर

किसी की याद का चेहरा

गुलनाज़ कौसर

हयात-ए-रवाँ

गुलनाज़ कौसर

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा

गुलनार आफ़रीन

ग़ैर वफ़ा में पुख़्ता हैं यूँ ही सही प मुझ सा भी

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

उस शोख़ से क्या कीजिए इज़्हार-ए-तमन्ना

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

टुक देखियो ये अबरू-ए-ख़मदार वही है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

बा'द-ए-मकीं मकाँ का गर बाम रहा तो क्या हुआ

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

जहान-ए-रंग-ओ-बू कितना हसीं है

ग़ुलाम नबी हकीम

शहर-ए-जाँ की फ़सीलों से बाहर

गुलाम जीलानी असग़र

कुछ तुम्हारी अंजुमन में ऐसे दीवाने भी थे

गुलाम जीलानी असग़र

जफ़ा-ए-दिल-शिकन

ग़ुलाम दस्तगीर मुबीन

क़त्ल उश्शाक़ किया करते हैं

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नज़्ज़ारा-ए-रुख़-ए-साक़ी से मुझ को मस्ती है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

मुँह ढाँप के मैं जो रो रहा हूँ

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

क्यूँकर न ख़ुश हो सर मिरा लटक्का के दार में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

किस क़दर मुझ को ना-तवानी है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

भूला है बा'द-ए-मर्ग मुझे दोस्त याँ तलक

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

सँभल के रहिएगा ग़ुस्से में चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन

दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआ

गोविन्द गुलशन

फिर मुझे जीने की दुआ दी है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

जब मिली उन से नज़र मिटने का सामाँ हो गया

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बात कुछ भी न थी फ़साना हुआ

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए

गोपालदास नीरज

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