हुआ Poetry (page 150)
बेदाद के ख़ूगर थे फ़रियाद तो क्या करते
फ़ानी बदायुनी
अपनी जन्नत मुझे दिखला न सका तू वाइज़
फ़ानी बदायुनी
इस तरह रहबर ने लूटा कारवाँ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़म से नाज़ुक ज़ब्त-ए-ग़म की बात है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़ैरत-ए-अहल-ए-चमन को क्या हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्मसार हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
इक तिश्ना-लब ने बढ़ के जो साग़र उठा लिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
वो आश्ना-ए-मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हुआ नहीं
फ़ना बुलंदशहरी
मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
फ़ना बुलंदशहरी
हुस्न-ए-बुताँ का इश्क़ मेरी जान हो गया
फ़ना बुलंदशहरी
हाँ वही इश्क़-ओ-मोहब्बत की जिला होती है
फ़ना बुलंदशहरी
ऐ सनम तुझ को हम भुला न सके
फ़ना बुलंदशहरी
आईना
फख्र ज़मान
ग़म-ए-जानाँ के सिवा कुछ हमें प्यारा न हुआ
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
मैं सुब्ह ख़्वाब से जागा तो ये ख़याल आया
फ़ैज़ी
किसे ढूँडता हूँ मैं अपने क़़ुर्ब-ओ-जवार में
फ़ैज़ी
कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ
फ़ैज़ी
जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का
फ़ैज़ी
इस लिए दिल बुरा किया ही नहीं
फ़ैज़ी
अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे
फ़ैज़ी
मैं अपनी ख़ुशियाँ अकेले मनाया करता हूँ
फ़ैज़ान हाशमी
अपने ख़ला में ला कि ये तुम को दिखा रहा हूँ मैं
फ़ैज़ान हाशमी
सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम
फ़ैज़ुल हसन
लोग कहते हैं कि क़ातिल को मसीहा कहिए
फ़ैज़ुल हसन
जाने क्या सोच के उस ने सितम ईजाद किया
फ़ैज़ुल हसन
चंग ओ नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ज़िंदाँ की एक सुब्ह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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