हुआ Poetry (page 48)

दूसरी बातों में हम को हो गया घाटा बहुत

शुजा ख़ावर

छोड़िए बाक़ी भी क्या रक्खा है उन के क़हर में

शुजा ख़ावर

चेहरे पे थोड़ी रक्खी है

शुजा ख़ावर

असर में देखिए अब कौन कम निकलता है

शुजा ख़ावर

निकलने वाले न थे ज़िंदगी के खेल से हम

शोज़ेब काशिर

एहसास की दीवार गिरा दी है चला जा

शोज़ेब काशिर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

खेल

शोरिश काश्मीरी

ख़तीब-ए-आज़म (सय्यद अता-उल्लाह-बुख़ारी)

शोरिश काश्मीरी

रास्ते पुर-पेच राही रुस्तगार

शोरिश काश्मीरी

ज़ख़्म-ए-दिल अब फूल बन कर खिल गया

शोला हस्पानवी

न ख़ून-ए-दिल है न मय का ख़ुमार आँखों में

शोला अलीगढ़ी

मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का

शोला अलीगढ़ी

दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुग़ाँ रहा

शोला अलीगढ़ी

ज़िंदगी तुझ पे गिराँ है तू मरेगा कैसे

शोहरत बुख़ारी

रस्म-ए-गिर्या भी उठा दी हम ने

शोहरत बुख़ारी

जब मंज़िलों वहम था न शब का

शोहरत बुख़ारी

जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है

शोहरत बुख़ारी

जाने किस किस की तवज्जोह का तमाशा देखा

शोहरत बुख़ारी

हर लम्हा था सौ साल का टलता भी तो कैसे

शोहरत बुख़ारी

इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है

शोहरत बुख़ारी

बे-नश्शा बहक रहा हूँ कब से

शोहरत बुख़ारी

आओ कि अभी छाँव सितारों की घनी है

शोहरत बुख़ारी

कभी वो रंज के साँचे में ढाल देता है

शोभा कुक्कल

ये धुँद ये ग़ुबार छटे तो पता चले

शोएब निज़ाम

मिल गया जब वो नगीं फिर ख़ूबी-ए-तक़दीर से

शोएब निज़ाम

जो तसव्वुर में है उस को कोई क्या रौशन करे

शोएब निज़ाम

दुनिया से दुनिया में रह कर कैसे किनारा कर रक्खा है

शोएब निज़ाम

चश्म-ए-गर्दूं फिर तमाज़त अपनी बरसाने लगी

शोएब निज़ाम

अजब तिलिस्म है नैरंग-ए-जावेदानी का

शोएब निज़ाम

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