हुआ Poetry (page 50)
निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी
ज़ौक़
नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए
ज़ौक़
मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
ज़ौक़
महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ
ज़ौक़
लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले
ज़ौक़
कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे
ज़ौक़
दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे
ज़ौक़
दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया
ज़ौक़
चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए
ज़ौक़
बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई
ज़ौक़
बाग़-ए-आलम में जहाँ नख़्ल-ए-हिना लगता है
ज़ौक़
आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती है
ज़ौक़
दख़्ल हर दिल में तिरा मिस्ल-ए-सुवैदा हो गया
शैख़ अली बख़्श बीमार
बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए
शैख़ अली बख़्श बीमार
इस क़दर ख़ुद पे हम जफ़ा न करें
शहज़ाद रज़ा लम्स
आसमाँ तुझ से किनारा कहीं करना है मुझे
शहज़ाद रज़ा लम्स
फिर से वही हालात हैं इम्काँ भी वही है
शहपर रसूल
मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं
शहपर रसूल
कब चला जाता है 'शहपर' कोई आ के सामने
शहपर रसूल
होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो
शहपर रसूल
एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने
शहपर रसूल
बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ
शहपर रसूल
यार को महरूम-ए-तमाशा किया
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
उठ सुब्ह हुई मुर्ग़-ए-चमन नग़्मा-सरा देख
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
शोख़ी ने तेरी लुत्फ़ न रक्खा हिजाब में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
शब वस्ल की भी चैन से क्यूँकर बसर करें
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
रोज़ ख़ूँ होते हैं दो-चार तिरे कूचे में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
मह्व हूँ मैं जो उस सितमगर का
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कुछ दर्द है मुतरिबों की लय में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
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