हुआ Poetry (page 52)

ख़्वाब नादिम हैं कि ता'बीर दिखाने से गए

शाज़ तमकनत

ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

दिल-शिकस्ता हुए टूटा हुआ पैमान बने

शाज़ तमकनत

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

वो ले के दिल को ये सोची कहीं जिगर भी है

शौक़ क़िदवाई

था बंद वो दर फिर भी मैं सौ बार गया था

शौक़ क़िदवाई

मारे ग़ुस्से के ग़ज़ब की ताब रुख़्सारों में है

शौक़ क़िदवाई

जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया

शौक़ क़िदवाई

हुई या मुझ से नफ़रत या कुछ इस में किब्र-ओ-नाज़ आया

शौक़ क़िदवाई

फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर

शौक़ क़िदवाई

दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था

शौक़ क़िदवाई

बाक़ी न रहे होश जुनूँ ऐसा हुआ तेज़

शौक़ माहरी

वो सनम ख़ूगर-ए-वफ़ा न हुआ

शौक़ देहलवी मक्की

शब-हाए-ऐश का वो ज़माना किधर गया

शौक़ देहलवी मक्की

ज़ाहिरन ये बुत तो हैं नाज़ुक गुल-ए-तर की तरह

शौक़ बहराइची

राज़ में रक्खेंगे हम तेरी क़सम ऐ नासेह

शौक़ बहराइची

मंज़िल है कठिन कम ज़ाद-ए-सफ़र मालूम नहीं क्या होना है

शौक़ बहराइची

महव-ए-नग़्मा मिरा क़ातिल जो रहा करता है

शौक़ बहराइची

इधर है बाद-ए-सुमूम नालाँ उधर है बर्क़-ए-तपाँ भी आजिज़

शौक़ बहराइची

हो कैसे किसी वादे का इक़रार रजिस्टर्ड

शौक़ बहराइची

'शौकत' हमारे साथ बड़ा हादिसा हुआ

शाैकत वास्ती

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

उन की निगाह-ए-नाज़ की गर्दिश के साथ साथ

शौकत परदेसी

इस फ़ैसले पे लुट गई दुनिया-ए-ए'तिबार

शौकत परदेसी

अधूरा हो के हूँ कितना मुकम्मल

शौकत परदेसी

मुझ को जहाँ में कोई दिल-आरा नहीं मिला

शौकत परदेसी

एक वहशत है रहगुज़ारों में

शौकत परदेसी

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