हुआ Poetry (page 46)

समुंदरों में सराब और ख़ुश्कियों में गिर्दाब देखता है

सिराज अजमली

क्या सोचते रहते हो तस्वीर बना कर के

सिराज अजमली

क्या दास्ताँ थी पहले बयाँ ही नहीं हुई

सिराज अजमली

जलने में क्या लुत्फ़ है ये तो पूछो तुम परवाने से

सिकंदर हयात ख़याल

रंग लाया दिवाना-पन मेरा

सिकंदर अली वज्द

बा-इज़्ज़त तरीक़े से जीने के जतन

सिदरा सहर इमरान

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

तू हर्फ़-ए-आख़िरी मिरा क़िस्सा तमाम है

सिदरा सहर इमरान

ग़मगीन बे-मज़ा बड़ी तन्हा उदास है

सिदरा सहर इमरान

मैं वो टूटा हुआ तारा जिसे महफ़िल न रास आई

सिद्दीक़ मुजीबी

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर

सिद्दीक़ मुजीबी

प्यासा जो मेरे ख़ूँ का हुआ था सो ख़्वाब था

सिद्दीक़ मुजीबी

मैं भी आवारा हूँ तेरे सात आवारा हवा

सिद्दीक़ मुजीबी

बिखरती टूटती शब का सितारा रख लिया मैं ने

सिद्दीक़ मुजीबी

बस एक बूँद थी औराक़-ए-जाँ में फैल गई

सिद्दीक़ मुजीबी

अजब पागल है दिल कार-ए-जहाँ बानी में रहता है

सिद्दीक़ मुजीबी

अब यही बेहतर है नक़्श-ए-आब होने दे मुझे

सिद्दीक़ मुजीबी

आग देखूँ कभी जलता हुआ बिस्तर देखूँ

सिद्दीक़ मुजीबी

दुख

सिद्दीक़ कलीम

शहर-ए-एहसास में ज़ख़्मों के ख़रीदार बहुत

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

ले उड़े ख़ाक भी सहरा के परस्तार मिरी

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

झोंका नफ़स का मौजा-ए-सरसर लगा मुझे

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जब खुले मुट्ठी तो सब पढ़ लें ख़त-ए-तक़्दीर को

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जब ध्यान में वो चाँद सा पैकर उतर गया

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हवा-ए-इश्क़ में शामिल हवस की लू ही रही

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

आ रही थी बंद कलियों के चटकने की सदा

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

जो दिल की बारगाह में तजल्लियाँ दिखा गया

सिद्दीक़ा शबनम

उस के जाने पे ये एहसास हुआ है 'शाहिद'

सिद्दीक़ शाहिद

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