हुआ Poetry (page 95)

जो ख़्वाब मेरे नहीं थे मैं उन को देखता था

साबिर वसीम

इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ

साबिर वसीम

हो कोई मसअला अपना दुआ पर छोड़ देते हैं

साबिर रज़ा

फूल बिखराती हर इक मौज-ए-हवा आती है

साबिर दत्त

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

वा'दा था कब का बार-ए-ख़ुदा सोचने तो दे

साबिर

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

साबिर

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

वो इस अदा से दुआ करेगा

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

आँखों में वो आएँ तो हँसाते हैं मुझे ख़्वाब

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

कहाँ पे बिछड़े थे हम लोग कुछ पता मिल जाए

सबा जायसी

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

उस का वादा ता-क़यामत कम से कम

सबा अकबराबादी

उजाला कर के ज़ुल्मत में घिरा हूँ

सबा अकबराबादी

मंज़िल पे पहुँचने का मुझे शौक़ हुआ तेज़

सबा अकबराबादी

हुस्न जो रंग ख़िज़ाँ में है वो पहचान गया

सबा अकबराबादी

हुजूम-ए-ग़म है क़ल्ब ग़म-ज़दा है

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है

सबा अकबराबादी

जताते रहते हैं ये हादसे ज़माने के

साइल देहलवी

होते ही जवाँ हो गए पाबंद-ए-हिजाब और

साइल देहलवी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

वो भी बिगड़ा, हुई रुस्वाई भी

सादुल्लाह शाह

हँसी की बात कि उस ने वहाँ बुला के मुझे

सादुल्लाह शाह

दश्त की प्यास बढ़ाने के लिए आए थे

सादुल्लाह शाह

नाव काग़ज़ की सही कुछ तो नज़र से गुज़रे

सादुल्लाह कलीम

मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है

एस ए मेहदी

मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है

एस ए मेहदी

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