हुआ Poetry (page 93)

बे-सबब ठीक नहीं घर से निकल कर जाना

सईद आरिफ़ी

कुछ हक़ीक़त तो हुआ करती थी इंसानों में

सईद अहमद अख़्तर

मिरा वजूद हवाला तिरा हुआ आख़िर

सईद अहमद

ज़वाल के आईने में ज़िंदा अक्स

सईद अहमद

जब बीनाई सावन ने चुराई हो

सईद अहमद

डूबते सूरज की सरगोशी

सईद अहमद

चिता में बैठी ख़्वाहिश

सईद अहमद

बद-गुमान

सईद अहमद

अधूरी नस्ल का पूरा सच

सईद अहमद

वही ख़राबा-ए-इम्काँ वही सिफ़ाल-ए-क़दीम

सईद अहमद

शोरिश-ए-वक़्त हुई वक़्त की रफ़्तार में गुम

सईद अहमद

पत्थर को पूजते थे कि पत्थर पिघल पड़ा

सईद अहमद

खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया

सईद अहमद

होने की इक झलक सी दिखा कर चला गया

सईद अहमद

इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए

सईद अहमद

रात दिन तू रहे रक़ीबाँ-संग

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

ज़ुल्फ़ तेरी हुई कमंद मुझे

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

मरे दिल बीच नक़्श-ए-नाज़नीं है

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

चौधवाँ उस चंदर का साल हुआ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

नहीं मा'लूम जीने का हुनर कैसा रखा है

सादिया सफ़दर सादी

दुरून-ए-चश्म हर इक ख़्वाब मर रहा है बस

सादिया सफ़दर सादी

वो जिस का रंग सलोना है बादलों की तरह

सादिक़ नसीम

नज़र नज़र से वो कलियाँ खिला खिला भी गया

सादिक़ नसीम

हर शख़्स को ऐसे देखता हूँ

सादिक़ नसीम

ये क्या हुआ कि हर इक रस्म-ओ-राह तोड़ गए

सादिक़ इंदौरी

महक रहा है बदन सारा कैसी ख़ुशबू है

सादिक़ इंदौरी

दिल को पैहम दर्द से दो-चार रहने दीजिए

सादिक़ इंदौरी

उन्हें कह दो

सादिक़

एक वसिय्यत

सादिक़

एक पुरानी नज़्म

सादिक़

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