प्रेम Poetry (page 82)

चश्म-ए-साक़ी का तसव्वुर बज़्म में काम आ गया

अज़ीज़ लखनवी

भड़क उट्ठेंगे शो'ले एक दिन दुनिया की महफ़िल में

अज़ीज़ लखनवी

बाज़ी-ए-इश्क़ मरे बैठे हैं

अज़ीज़ लखनवी

हुस्न है दाद-ए-ख़ुदा इश्क़ है इमदाद-ए-ख़ुदा

अज़ीज़ हैदराबादी

हम को सँभालता कोई क्या राह-ए-इश्क़ में

अज़ीज़ हैदराबादी

न बदलना था न बदला दिल-ए-शैदा अपना

अज़ीज़ हैदराबादी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

सब पेच-ओ-ताब-ए-शौक़ के तूफ़ान थम गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

नक़्शे उसी के दिल में हैं अब तक खिंचे हुए

अज़ीज़ हामिद मदनी

न फ़ासले कोई निकले न क़ुर्बतें निकलीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

जी है बहुत उदास तबीअत हज़ीं बहुत

अज़ीज़ हामिद मदनी

कुछ ज़िंदगी में इश्क़-ओ-वफ़ा का हुनर भी रख

अज़ीज़ अन्सारी

उस को आदाब बिछड़ने के सिखाता हुआ मैं

अज़हर इनायती

शुरू-ए-इश्क़ में लोगों ने इतनी शिद्दत की

अज़हर इनायती

ग़मों से यूँ वो फ़रार इख़्तियार करता था

अज़हर इनायती

कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

अज़हर फ़राग़

हँसने-हँसाने पढ़ने-पढ़ाने की उम्र है

अज़हर फ़राग़

जब तिरे ख़्वाब से बेदार हुआ करते थे

अज़हर अब्बास

अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं

अज़हर अब्बास

वो शोख़ दिल-ओ-जाँ की तमन्ना तो न निकला

अज़ीम कुरेशी

सुरूर-ए-इश्क़ की मस्ती कहाँ है सब के लिए

अज़ीम कुरेशी

रंग कहाँ है साया सा है

अज़ीम कुरेशी

बीच दिलों में उतरा तो है

अज़ीम कुरेशी

ख़ुलूस-ए-नियत-ए-रहबर पे मुनहसिर है 'अज़ीम'

अज़ीम मुर्तज़ा

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

तेरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

तिरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके

आज़म चिश्ती

दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं

अयाज़ झाँसवी

आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक

औरंगज़ेब

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